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RBI फिर क्यों ला रहा प्लास्टिक नोट?: 16 साल में तीसरी कोशिश, इस बार क्यों बढ़ी उम्मीद; जानिए हर सवाल का जवाब

15 अगस्त विज्ञापन


डिजिटल पेमेंट के तेजी से बढ़ते दौर के बावजूद देश में नकदी की मांग लगातार बढ़ रही है। इसी बढ़ती जरूरत को देखते हुए भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) एक बार फिर पॉलीमर यानी प्लास्टिक बैंकनोट लाने की तैयारी में है। बिजनेस स्टैंडर्ड की रिपोर्ट के अनुसार, केंद्रीय बैंक जल्द ही पॉलीमर नोटों का पायलट प्रोजेक्ट शुरू करने की घोषणा कर सकता है। यह पिछले 16 वर्षों में तीसरी बड़ी कोशिश होगी। आइए जानते हैं कि प्लास्टिक बैंकनोट क्या हैं, ये कागजी नोटों से कैसे अलग हैं और इस बार इनके सफल होने की संभावना क्यों ज्यादा मानी जा रही है।

क्या होते प्लास्टिक बैंकनोट हैं?

प्लास्टिक बैंकनोट, जिन्हें आधिकारिक रूप से पॉलीमर बैंकनोट कहा जाता है, पारंपरिक कॉटन-बेस्ड कागज की बजाय पॉलीमर नामक विशेष प्लास्टिक सब्सट्रेट से बनाए जाते हैं। हालांकि इन्हें प्लास्टिक नोट कहा जाता है, लेकिन ये क्रेडिट या डेबिट कार्ड की तरह कठोर नहीं होते। ये हल्के, लचीले होते हैं और इन्हें सामान्य कागजी नोटों की तरह आसानी से मोड़ा और इस्तेमाल किया जा सकता है।

कागजी नोटों से कैसे अलग होते हैं प्लास्टिक नोट?

पॉलीमर नोटों की सबसे बड़ी खासियत उनका टिकाऊ होना है। ये गंदगी, नमी और फटने जैसी समस्याओं के प्रति अधिक प्रतिरोधी होते हैं। इसी वजह से इनकी उम्र सामान्य कागजी नोटों की तुलना में काफी अधिक होती है। इनमें उच्च सुरक्षा फीचर्स भी जोड़े जा सकते हैं, जैसे- सी-थ्रू (पारदर्शी) विंडो, माइक्रो-ऑप्टिक होलोग्राम, विशेष सुरक्षा स्याही, नकली नोटों की पहचान आसान बनाने वाली तकनीक इन सुरक्षा उपायों के कारण इनकी नकल करना काफी मुश्किल हो जाता है।

RBI अभी प्लास्टिक नोटों पर फिर से क्यों विचार कर रहा है?

हाल के वर्षों में नकदी की मांग तेजी से बढ़ी है। रिजर्व बैंक की वार्षिक रिपोर्ट के मुताबिक, वित्त वर्ष 2024-25 में बैंकनोटों की छपाई पर 6,372.8 करोड़ रुपये खर्च हुए, जबकि इससे पिछले वर्ष यह खर्च 5,101.4 करोड़ रुपये था। इसी दौरान बड़ी संख्या में पुराने और खराब नोट भी चलन से बाहर हुए। अकेले FY25 में करीब 23.8 अरब खराब बैंकनोट नष्ट किए गए, जिनमें ₹500 और ₹100 के नोटों की संख्या सबसे अधिक रही। रिजर्व बैंक का मानना है कि ₹10 और ₹20 जैसे छोटे मूल्यवर्ग के नोट बार-बार इस्तेमाल होने के कारण जल्दी खराब हो जाते हैं। पॉलीमर नोट इस समस्या का समाधान बन सकते हैं।

भारत में प्लास्टिक नोटों की शुरुआत कब हुई थी?

भारत में पॉलीमर नोट लाने की प्रक्रिया पहली बार अप्रैल 2010 में शुरू हुई थी। उस समय रिजर्व बैंक ने प्री-क्वालिफिकेशन नोटिस जारी किया था, जिसमें आठ कंपनियों ने रुचि दिखाई थी। इसके बाद 2013-14 तक प्रक्रिया आगे बढ़ी।

किन शहरों में प्लास्टिक नोटों का ट्रायल प्रस्तावित था?

सरकार ने संसद में बताया था कि ₹10 मूल्यवर्ग के एक अरब पॉलीमर नोटों का फील्ड ट्रायल पांच शहरों में प्रस्तावित था, जिनमें जयपुर, शिमला, भुवनेश्वर, मैसूर और कोच्चि का नाम शामिल था। इन शहरों का चयन अलग-अलग भौगोलिक और जलवायु परिस्थितियों को ध्यान में रखकर किया गया था।

सरकार ने दूसरी बार कब मंजूरी दी थी?

मार्च 2017 में केंद्र सरकार ने ₹10 के पॉलीमर नोटों के फील्ड ट्रायल को दोबारा मंजूरी दी थी। इसके तहत पॉलीमर शीट खरीदने और नोटों की छपाई की भी स्वीकृति दी गई थी।

पहले दो प्रयास सफल क्यों नहीं हो सके?

पिछले दोनों प्रयास तकनीकी और परिचालन संबंधी चुनौतियों के कारण आगे नहीं बढ़ पाए। इसके मुख्य कारण ये थे कि देश के अधिकांश एटीएम कागजी नोटों के अनुसार डिजाइन किए गए थे। कैश डिपॉजिट मशीनें और नोट गिनने वाली मशीनें पॉलीमर नोटों को सही ढंग से प्रोसेस नहीं कर पा रही थीं। मशीनों को अपग्रेड करने की लागत बहुत अधिक थी। पॉलीमर शीट पूरी तरह आयात करनी पड़ती थी, जिससे परियोजना महंगी हो जाती थी। इसलिए इस बार भी प्रयास को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया था। 

इस बार की योजना में क्या बड़ा बदलाव किया गया है?

इस बार केवल पॉलीमर शीट आयात करने की बजाय देश में ही पॉलीमर शीट का निर्माण कराने की योजना बनाई जा रही है। रिजर्व बैंक ऐसी कंपनियों की तलाश में है जो सिर्फ आपूर्ति ही नहीं, बल्कि भारत में पॉलीमर शीट का उत्पादन भी कर सके। इससे आयात पर निर्भरता घटेगी और लागत भी कम होगी।


एटीएम और बैंकिंग सिस्टम में क्या बदलाव होंगे?

इस बार सभी एटीएम और कैश हैंडलिंग सिस्टम को पॉलीमर नोटों के अनुकूल बनाने की तैयारी की जा रही है। इसके तहत एटीएम मशीनों को अपग्रेड किया जाएगा। कैश डिपॉजिट मशीनों में बदलाव होंगे। नोट गिनने वाली मशीनों को भी पॉलीमर नोटों के अनुरूप बनाया जाएगा। इसी वजह से माना जा रहा है कि इस बार तकनीकी बाधाएं पहले की तुलना में काफी कम रहेंगी।

फिलहाल कितने देशों में प्लास्टिक नोट चल रहे हैं?

दुनिया के 60 से अधिक देशों ने पूरी तरह या आंशिक रूप से पॉलीमर बैंकनोट अपनाए हैं। 1988 में ऑस्ट्रेलिया प्लास्टिक नोट जारी करने वाला पहला देश बना था। इसके बाद कई देशों ने इन्हें अपनाया, जिनमें, कनाडा, यूनाइटेड किंगडम, सिंगापुर, मलेशिया, थाईलैंड, इंडोनेशिया, रोमानिया, न्यूजीलैंड और वियतनाम का नाम प्रमुखता से शामिल हैं। कई देशों ने अधिक टिकाऊपन, कम रिप्लेसमेंट लागत और बेहतर सुरक्षा को इसके प्रमुख फायदे बताया है।

क्या भारत में सभी कागजी नोट बदल दिए जाएंगे?

फिलहाल ऐसा नहीं होगा। रिजर्व बैंक पहले पायलट प्रोजेक्ट शुरू करेगा। सबसे पहले ₹10 और ₹20 जैसे छोटे मूल्यवर्ग के नोटों का परीक्षण किए जाने की संभावना है, क्योंकि यही नोट सबसे ज्यादा चलन में रहते हैं और सबसे जल्दी खराब होते हैं। यदि पायलट प्रोजेक्ट सफल रहता है और लोगों की सकारात्मक प्रतिक्रिया मिलती है, तभी चरणबद्ध तरीके से पॉलीमर नोटों का दायरा बढ़ाया जाएगा।

कागजी नोटों की छपाई और खराब नोटों का मौजूदा आंकड़ा क्या है?

वित्त वर्ष 2024-25 में नोट छापने पर 6,372.8 करोड़ रुपये खर्च हुए। इसी अवधि में 23.8 अरब खराब बैंकनोट नष्ट किए गए। खराब होने वाले नोटों में ₹500 और ₹100 के नोटों की हिस्सेदारी सबसे अधिक रही।

ये भी पढ़ें: RBI की बड़ी तैयारी: देश में अगले साल से आ सकते हैं प्लास्टिक के नोट, 10 और 20 रुपये से होगी शुरुआत

छोटे नोटों की जगह सिक्कों को बढ़ावा देने की योजना क्यों सफल नहीं हुई?

जब पॉलीमर नोटों की योजना तकनीकी कारणों से अटक गई थी, तब रिजर्व बैंक ने छोटे मूल्यवर्ग के नोटों की जगह सिक्कों के उपयोग को बढ़ावा देने की कोशिश की थी। हालांकि आम लोगों के बीच सिक्कों की स्वीकार्यता अपेक्षित स्तर तक नहीं बढ़ सकी। लेनदेन में लोग अब भी ₹10 और ₹20 के नोटों को सिक्कों की तुलना में अधिक सुविधाजनक मानते हैं। यही वजह है कि छोटे मूल्यवर्ग के टिकाऊ नोटों की जरूरत लगातार महसूस की जा रही है।



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