रायगढ़ वन विभाग में ‘महाघोटाले’ की आहट? 2 महीने तक दबाए रखी फाइल, फिर दिया ‘गुमराह’ करने वाला जवाब; क्या खाद के ‘काले खेल’ को छिपाने की हो रही साजिश?
Is a major scam brewing in the Raigarh Forest Department? The file was kept under wraps for two months, and then a misleading response was given; is there a conspiracy to cover up the illegal activities related to fertilizer?

गौरीशंकर गुप्ता/रायगढ़ (विशेष रिपोर्ट) : रायगढ़ वन विभाग में पारदर्शिता नाम की चीज शायद बची ही नहीं है। वृक्षारोपण के लिए खरीदी गई खाद के बिल मांगने पर विभाग ने न केवल सूचना के अधिकार (RTI) कानून की धज्जियां उड़ाते हुए 30 दिन की समय सीमा को 60 दिन (2 महीने) में बदल दिया, बल्कि अंत में ऐसा जवाब दिया जो किसी भी जिम्मेदार अधिकारी की कार्यशैली पर प्रश्नचिह्न लगाता है।
कानून का खुला उल्लंघन :
30 दिन का जवाब 63 दिन में : आरटीआई कानून की धारा 7(1) स्पष्ट कहती है कि आवेदन प्राप्ति के 30 दिनों के भीतर जानकारी दी जानी चाहिए।
* आवेदन प्राप्ति दिनांक: 09.10.2025
* जवाब का दिनांक: 11.12.2025
सीधे तौर पर यह जवाब 2 महीने (लगभग 63 दिन) बाद दिया गया। क्या रायगढ़ के वनमंडलाधिकारी (DFO) और जनसूचना अधिकारी को यह जवाब देने में इतना वक्त इसलिए लगा क्योंकि वे यह तय नहीं कर पा रहे थे कि ‘सच’ को कैसे छुपाया जाए? विलंब के लिए कोई कारण न बताना सीधे तौर पर जुर्माना (Penalty) का मामला बनता है।

‘मद’ का बहाना और विभाग का झूठ :
हम बताते हैं कौन से ‘मद’ होते हैं! विभाग ने अपने जवाब में लिखा है कि “किस योजना/मद के तहत जानकारी चाही गई है, यह स्पष्ट नहीं है”। यह जवाब पूरी तरह से भ्रामक (Misleading) और हास्यास्पद है।
एक DFO (वनमंडलाधिकारी) को अपने जिले में चल रहे कार्यों के ‘हेड’ (Head) नहीं पता होंगे, यह मानना मुश्किल है। हमारी ऑनलाइन पड़ताल और विभागीय जानकारी के अनुसार, वन विभाग में वृक्षारोपण मुख्य रूप से इन गिने-चुने मदों (Heads) में ही होता है, जिनकी जानकारी एक क्लिक पर निकाली जा सकती थी :
* कैम्पा मद (CAMPA Fund): रायगढ़ जैसे जिलों में सबसे ज्यादा वृक्षारोपण इसी मद से होता है।
* डीएमएफ (DMF – जिला खनिज न्यास): रायगढ़ एक खनन प्रभावित क्षेत्र है, यहाँ करोड़ों रुपये डीएमएफ से वृक्षारोपण में खर्च होते हैं।
* विभागीय मद / राज्य योजना (State Plan) : विभाग का अपना सालाना बजट।
* मनरेगा (MNREGA) : वन विभाग और पंचायत के अभिसरण (Convergence) से होने वाले कार्य।
* हरियर छत्तीसगढ़ योजना : राज्य सरकार की विशेष योजना।
* नदी तट एवं पथ वृक्षारोपण : विशेष मद।
जब एक आम नागरिक “2024-25 में हुई कुल खाद खरीदी” के बिल मांग रहा है, तो विभाग यह कह सकता था कि “इन-इन मदों में खरीदी हुई है, आप किसका बिल चाहते हैं?” लेकिन ऐसा न करके सीधे जानकारी देने से मना कर देना, उनकी नीयत में खोट को दर्शाता है।
सवाल जो चुभेंगे :
* क्या विभाग के पास साल भर की खरीदी का स्टॉक रजिस्टर नहीं है?
* अगर खरीदी ईमानदारी से हुई है, तो बिल और वाउचर दिखाने में डर कैसा?
* 2 महीने तक फाइल को टेबल पर रोककर रखने का मकसद क्या था? क्या इस दौरान दस्तावेजों (बिल/वाउचर) में कोई ‘सुधार’ या ‘फेरबदल’ किया जा रहा था?
दाल में काला नहीं, पूरी दाल ही काली है :
यह मामला सिर्फ जानकारी न देने का नहीं, बल्कि ‘जनता के पैसे’ की लूट को ‘कागजी दांव-पेच’ में उलझाकर दबाने का है। 2 महीने बाद दिया गया यह ‘गोलमोल’ जवाब प्रथम अपीलीय अधिकारी और सूचना आयोग के लिए एक मजबूत केस है। यदि इस मामले की निष्पक्ष जांच हो, तो खाद खरीदी के नाम पर हुए लाखों-करोड़ों के वारे-न्यारे सामने आ सकते हैं।




