छत्तीसगढ़

रायगढ़ पुलिस के ‘शॉर्टकट’ पर हाईकोर्ट का हथौड़ा : बिना सहमति नार्को और ब्रेन मैपिंग पर लगाई रोक, प्रताड़ना पर दी सख्त हिदायत…

15 अगस्त विज्ञापन

(गौरी शंकर गुप्ता) बिलासपुर। कानून की आड़ में रायगढ़ पुलिस द्वारा संदिग्धों से सच उगलवाने के लिए अपनाए जा रहे ‘शॉर्टकट’ और प्रताड़ना के तौर-तरीकों पर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए साफ कर दिया है कि “किसी भी व्यक्ति की सहमति के बिना उसे नार्को-एनालिसिस, पॉलीग्राफ या किसी अन्य वैज्ञानिक जांच के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।”

हाईकोर्ट का यह आदेश रायगढ़ पुलिस की कार्यप्रणाली पर एक बड़ा कानूनी तमाचा है, जिसने नागरिक अधिकारों को ताक पर रखकर जांच का नया ढर्रा बना लिया था।

रायगढ़ का चक्रधरनगर थाना : FIR में नाम नहीं, फिर भी 18 दिनों का ‘मानसिक टॉर्चर’ – यह पूरा मामला रायगढ़ जिले के चक्रधरनगर थाना क्षेत्र का है। पुलिस ने हत्या और सबूत मिटाने के आरोप में अज्ञात आरोपियों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 103 (1) और 238(A) के तहत मामला दर्ज किया था। लेकिन जांच के नाम पर पुलिस ने जो किया, उसने खाकी को कटघरे में खड़ा कर दिया:

* बिना सबूत बंधक जैसी स्थिति : पुलिस ने संदेह के आधार पर ग्राम बेहरापाली निवासी किसान लक्ष्मीनारायण पटेल और ग्राम महापल्ली निवासी अर्धना भगत को पूछताछ के लिए बुलाया। पीड़ितों का नाम न तो FIR में था, और न ही 16 जून 2026 की जांच रिपोर्ट में उनके खिलाफ कोई सबूत मिला।
* कानून की धज्जियां : नए कानून ‘भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता’ (BNSS) के तहत बिना कोई विधिवत नोटिस जारी किए, पुलिस ने दोनों को लगातार 18 दिनों तक थाने बुलाकर मानसिक रूप से प्रताड़ित किया।
* जबरन दस्तखत और मोबाइल जब्ती : याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि पुलिस ने दबाव डालकर उनसे ‘सुपुर्दनामा’ पर दस्तखत कराए और बिना उचित कानूनी प्रक्रिया अपनाए उनके मोबाइल भी जब्त कर लिए।

बिना कोर्ट की इजाजत : रायगढ़ पुलिस ने खुद ही चुन लिया ‘नार्को टेस्ट’ का रास्ता! – हद तो तब हो गई जब रायगढ़ पुलिस ने बिना किसी न्यायिक अनुमति और पीड़ितों की मर्जी के, 20 जून को एक नोटिस जारी कर दिया। इस नोटिस में पीड़ितों को 22 और 23 जून 2026 को रायपुर में ब्रेन मैपिंग, पॉलीग्राफ और नार्को-एनालिसिस टेस्ट के लिए उपस्थित होने का फरमान सुनाया गया। पुलिस के इस दबाव से तंग आकर पीड़ितों ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

> हाईकोर्ट का कड़ा रुख : “जांच एजेंसी किसी भी नागरिक को नार्को-एनालिसिस, पॉलीग्राफ या ब्रेन इलेक्ट्रिकल एक्टिवेशन प्रोफाइल (BEAP) टेस्ट जैसी वैज्ञानिक जांच के लिए बाध्य नहीं कर सकती। यदि ऐसे परीक्षण की आवश्यकता है, तो वह केवल संबंधित व्यक्ति की स्वतंत्र, स्पष्ट और पूरी जानकारी के साथ दी गई सहमति के आधार पर ही हो सकता है।”

हाईकोर्ट का आदेश : वैज्ञानिक जांच पर तुरंत रोक, पुलिस सुधारे अपनी कार्यप्रणाली – मामले की गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने पीड़ितों को बड़ी राहत देते हुए उनके नार्को, पॉलीग्राफ और ब्रेन मैपिंग परीक्षणों पर तत्काल रोक लगा दी है। इसके साथ ही, कोर्ट ने रायगढ़ पुलिस को सख्त हिदायत दी है कि वे जांच के नाम पर नागरिकों के साथ इस तरह की सख्ती और गैर-कानूनी बर्बरता तुरंत बंद करें।

यह फैसला रायगढ़ पुलिस प्रशासन के लिए एक बड़ा सबक है। नए कानून पुलिस को अपराधियों पर नकेल कसने का अधिकार देते हैं, निर्दोष नागरिकों को प्रताड़ित करने या बिना कोर्ट की मर्जी के नार्को टेस्ट का डर दिखाने का नहीं। अब देखना यह है कि कोर्ट की इस फटकार के बाद रायगढ़ पुलिस की कार्यप्रणाली में क्या सुधार आता है।

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