रायपुर

लंबी वेटिंग से यात्रियों की परेशानी बढ़ी:ट्रेनों में नो-रूम, सीधी ट्रेनों का नो-रूट; जो हैं उनमें कंफर्म टिकट नहीं मिल रहा

15 अगस्त विज्ञापन

दुर्ग-रायपुर से देश के कई प्रमुख शहरों के लिए ट्रेनें हैं, लेकिन कई रूटों पर सीधी सेवा नहीं होने और मौजूदा ट्रेनों में लंबी वेटिंग से यात्रियों की परेशानी बढ़ रही है। हरिद्वार के लिए दुर्ग-रायपुर से सीधी नियमित ट्रेन नहीं है। यात्रियों को बिलासपुर जाकर उत्कल एक्सप्रेस पकड़नी पड़ती है। कामाख्या के लिए साप्ताहिक कर्मभूमि एक्सप्रेस में स्लीपर और एसी दोनों में नो-रूम की स्थिति है। वाराणसी जाने वाली ट्रेनों में भी लंबी वेटिंग है। मुंबई रूट पर यात्री दबाव के कारण सीटें जल्दी भर रही हैं। इसी परेशानी को देखते हुए दुर्ग सांसद विजय बघेल ने रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव को पत्र भेजकर नई ट्रेनें शुरू करने और मौजूदा सेवाओं को नियमित करने की मांग की है। इसमें दुर्ग-हरिद्वार स्पेशल और दुर्ग-सुल्तानपुर स्पेशल को नियमित करने, दुर्ग-नौतनवा एक्सप्रेस को रोज चलाने का प्रस्ताव है। दुर्ग-अमृतसर, दुर्ग-बनारस वंदे भारत और कामाख्या-दुर्ग अमृत भारत एक्सप्रेस शुरू करने की भी मांग की गई है। दुर्ग-अंबिकापुर इंटरसिटी और कोरबा-रायपुर इंटरसिटी को दुर्ग तक विस्तारित करने का प्रस्ताव भी दिया गया है। हरिद्वार के लिए पहले बिलासपुर का सफर : दुर्ग और रायपुर से हरिद्वार की सीधी नियमित ट्रेन नहीं होने के कारण यात्रियों को पहले बिलासपुर पहुंचना पड़ता है। वहां से उत्कल एक्सप्रेस पकड़कर हरिद्वार जाना होता है। यात्री राम कुमार के मुताबिक दुर्ग से बिलासपुर पहुंचने में करीब दो घंटे लगते हैं। इसके बाद ट्रेन पकड़ने के लिए अतिरिक्त समय और स्थानीय परिवहन का खर्च भी जुड़ता है। परिवार, बुजुर्ग और महिलाओं के लिए यह सफर ज्यादा परेशानी वाला है। दुर्ग-हरिद्वार स्पेशल नियमित होने पर यह अतिरिक्त यात्रा खत्म हो सकती है। यात्रीगण ध्यान दें… कामाख्या की ट्रेन में नो-रूम, वाराणसी में वेटिंग कामाख्या के लिए कर्मभूमि एक्सप्रेस प्रमुख विकल्प है, लेकिन साप्ताहिक होने के कारण इसमें मांग ज्यादा है। मौजूदा स्थिति में स्लीपर और एसी दोनों में नो-रूम है। वाराणसी के लिए सारनाथ और गोंदिया-बरौनी ट्रेनें हैं, जबकि दुर्ग-नौतनवा एक्सप्रेस सप्ताह में तीन दिन चलती है। इनमें भी कंफर्म टिकट के लिए लंबी वेटिंग है। ऐसे में यात्रियों को यात्रा की तारीख बदलनी पड़ती है या दूसरे विकल्प तलाशने पड़ते हैं। मुंबई रूट पर भी सीटों का दबाव रायपुर-दुर्ग मुंबई-हावड़ा रेल कॉरिडोर पर हैं। मुंबई की ओर जाने वाली ट्रेनों में लगातार यात्री दबाव रहता है। सीट नहीं मिलने पर विकल्प सीमित हो जाते हैं। नई ट्रेन या मौजूदा सेवाओं के विस्तार से ट्रेनों पर दबाव बंटने के साथ यात्रियों को अलग-अलग दिनों में सफर का विकल्प मिल सकेगा। नई ट्रेनें और नियमित सेवाओं से ये सब बदलेगा दुर्ग-हरिद्वार स्पेशल नियमित होने से हरिद्वार के लिए सीधा विकल्प मिलेगा। दुर्ग-नौतनवा को सप्ताह में तीन दिन के बजाय रोज चलाने से टिकट उपलब्धता बढ़ सकती है। दुर्ग-अमृतसर से पंजाब और दुर्ग-बनारस वंदे भारत से वाराणसी की सीधी कनेक्टिविटी बढ़ेगी। कामाख्या-दुर्ग अमृत भारत शुरू होने से साप्ताहिक कर्मभूमि एक्सप्रेस पर निर्भरता कम होगी। दुर्ग-अंबिकापुर और कोरबा-रायपुर इंटरसिटी का दुर्ग तक विस्तार होने से प्रदेश के भीतर भी सीधे विकल्प बढ़ेंगे। आवेदन के बाद क्यों तुरंत नहीं चलती नई ट्रेन? नई ट्रेन के प्रस्ताव पर रेलवे सबसे पहले रूट की लाइन क्षमता और टाइम स्लॉट की उपलब्धता देखता है। इसके बाद रैक-कोच, पिट लाइन और मेंटेनेंस सुविधा, लोको पायलट, ट्रेन मैनेजर व अन्य स्टाफ की उपलब्धता जांची जाती है। ट्रैक, सिग्नल-इलेक्ट्रिक सिस्टम की क्षमता के साथ यात्री मांग और संभावित उपयोगिता का भी आकलन होता है। संबंधित विभागों की रिपोर्ट के बाद ही प्रस्ताव पर निर्णय लिया जाता है। सांसद महोदय द्वारा की गई मांगों का संबंधित विभाग द्वारा गहन विश्लेषण किया जाता है। मांग की व्यवहारिकता, यात्री सुविधा और अन्य आवश्यक पहलुओं का परीक्षण करने के बाद ही इस पर निर्णय लिया जाता है।
-शेख समी उर रहमान, सीपीआरओ, बिलासपुर मुख्यालय

15 अगस्त विज्ञापन
विज्ञापन 1
विज्ञापन 2
विज्ञापन 3
विज्ञापन 4
विज्ञापन 5
विज्ञापन 6
विज्ञापन 7
विज्ञापन 8

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!