हसदेव बांगो बांध से प्रभावित गांवों के मछुआरों ने ठेकेदारी व्यवस्था के खिलाफ खोला मोर्चा, शोषण और कम पारिश्रमिक पर जताई कड़ी नाराजगी
Fishermen from villages affected by the Hasdeo Bango dam have launched a protest against the contract system, expressing strong resentment over exploitation and low wages

कोरबा: हसदेव बांगो बांध परियोजना से प्रभावित गांवों के मछुआरों ने ठेकेदारी व्यवस्था के खिलाफ अब खुले रूप में मोर्चा खोल दिया है। एतमानगर, बांगो, माचाडोली, लालपुर सहित आसपास के कई गांवों के मछुआरे लंबे समय से ठेके पर मत्स्य पालन कराने वाली व्यवस्था से असंतुष्ट रहे हैं। उनका आरोप है कि बहुद्देशीय हसदेव बांगो बांध परियोजना के लिए जमीन, घर और पुरखों की बस्ती छोड़ने के बाद भी उन्हें न तो पर्याप्त मुआवजा मिला, न ही जीविकोपार्जन के स्थायी साधन, उल्टा जो जलाशय उनकी आजीविका का आधार बना, उसी पर बाहरी ठेकेदारों का कब्जा करवा दिया गया।
बांगो में आयोजित बैठक में बड़ी संख्या में मछुआरे उपस्थित हुए और सर्वसम्मति से यह निर्णय लिया कि अब वे ठेकेदारी व्यवस्था के अंतर्गत काम नहीं करेंगे। बैठक में वक्ताओं ने कहा कि ठेकेदारों की शर्तें बेहद कठोर हैं, जिसमें जोखिम और मेहनत तो पूरी मछुआरों की है, लेकिन लाभ का बड़ा हिस्सा ठेकेदारों की जेब में चला जाता है। मछुआरों ने बताया कि सुबह तड़के से लेकर देर रात तक जलाशय में मेहनत करने के बावजूद उन्हें जो पारिश्रमिक मिलता है, उससे परिवार का भरण-पोषण मुश्किल हो रहा है। महंगाई के इस दौर में बच्चों की शिक्षा, इलाज और रोजमर्रा के खर्च पूरे करना भारी पड़ रहा है।
मछुआरों ने यह भी आरोप लगाया कि ठेकेदारी व्यवस्था में सुरक्षा, बीमा और सामाजिक सुरक्षा से जुड़े अधिकारों की पूरी तरह अनदेखी होती है। जलाशय में दुर्घटना की स्थिति में न तो ठेकेदार कोई जिम्मेदारी लेते हैं और न ही प्रभावित परिवारों को समुचित आर्थिक सहायता मिलती है। कई मछुआरों ने उदाहरण देते हुए कहा कि बीते वर्षों में नाव पलटने या तेज़ हवाओं में जाल डालते समय हुई दुर्घटनाओं में साथी मछुआरों की जान चली गई, लेकिन परिवारों को नाममात्र की मदद भी नहीं मिली। इस दर्दनाक अनुभव ने समुदाय के भीतर आक्रोश और असुरक्षा की भावना को और गहरा कर दिया है।
बैठक में वक्ताओं ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अब समय आ गया है जब मछुआरे खुद अपने कारोबार के मालिक बनें। उन्होंने मांग रखी कि हसदेव बांगो जलाशय में मत्स्य पालन का पट्टा सीधे मछुआरा सहकारी समितियों को दिया जाए, बाहरी ठेकेदारों को नहीं। मछुआरों का कहना था कि यदि सरकार सीधे उन्हें अधिकार दे, तो वे संगठित होकर मत्स्य बीज डालने से लेकर पकड़ और विपणन तक की पूरी प्रक्रिया स्वयं संभाल सकते हैं। इससे न केवल उनकी आय में बढ़ोत्तरी होगी, बल्कि पूरे इलाके में रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे।
मछुआरा समुदाय की नाराजगी का बड़ा कारण बेहद कम पारिश्रमिक भी रहा। जानकारी के मुताबिक, वर्तमान व्यवस्था में प्रति किलोग्राम मछली पर जो दर दी जाती है, वह न तो बाजार भाव के अनुरूप है और न ही लगातार बढ़ती लागतों के मुकाबले न्यायसंगत। डीज़ल, नाव मरम्मत, जाल, बरसाती कपड़े और अन्य सामग्री पर खर्च के बाद मछुआरों के हाथ में नगण्य राशि बचती है। कई मछुआरों ने शिकायत की कि भुगतान भी अक्सर समय पर नहीं होता, जिससे उन्हें साहूकारों और सूदखोरों से कर्ज लेना पड़ता है और शोषण का चक्र निरंतर चलता रहता है।
बैठक में महिलाओं ने भी अपनी राय रखी। उन्होंने कहा कि मछली पकड़ने के साथ-साथ उसकी साफ-सफाई और बाजार तक पहुंचाने में महिलाओं की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है, लेकिन ठेकेदारी व्यवस्था में उनके योगदान की कोई मान्यता नहीं है। महिलाओं ने मांग की कि यदि सहकारी समिति के माध्यम से मत्स्य पालन का अधिकार दिया जाए, तो समिति के प्रबंधन में महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित की जाए। इससे महिलाएँ आर्थिक रूप से सशक्त होंगी और परिवार की आय में उनकी सीधी हिस्सेदारी बढ़ेगी।
मछुआरों ने स्थानीय प्रशासन और राज्य सरकार से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है। उनका कहना है कि बहुद्देशीय परियोजना के कारण आज भी वे विस्थापन, बेरोजगारी और आर्थिक असुरक्षा की त्रासदी से जूझ रहे हैं, और ठेकेदारी व्यवस्था इस पीड़ा को और बढ़ा रही है। मछुआरों ने चेतावनी दी कि यदि उनकी बातों पर गंभीरता से विचार नहीं किया गया, तो वे जलाशय में सामूहिक जाल बहिष्कार, धरना और प्रदर्शन जैसे आंदोलनकारी कदम उठाने के लिए मजबूर होंगे।
बैठक में यह प्रस्ताव भी पारित किया गया कि प्रभावित गांवों के सभी मछुआरे मिलकर एक संयुक्त संघर्ष समिति का गठन करेंगे। यह समिति सरकार और प्रशासन के समक्ष उनकी बात रखेगी, कानूनी विकल्पों पर विचार करेगी और आवश्यक होने पर बड़े स्तर पर आंदोलन की रणनीति तैयार करेगी। मछुआरों ने कहा कि उनका लक्ष्य किसी के साथ टकराव नहीं, बल्कि अपने उचित अधिकारों की प्राप्ति है। वे चाहते हैं कि सरकार उनके ऐतिहासिक अधिकारों और आजीविका की वास्तविक स्थिति को समझते हुए ऐसी नीति लाए जो उन्हें स्थायी आर्थिक सुरक्षा दे सके।
बैठक के अंत में मछुआरों ने एक स्वर में कहा कि वे अब और शोषण सहने को तैयार नहीं हैं। जलाशय, जिसकी कीमत पर उन्होंने अपना सबकुछ खोया, उसी जल पर उनका पहला अधिकार है और वे इसे ठेकेदारों के हाथों में गिरवी नहीं रखना चाहते। प्रस्ताव पास किया गया कि आने वाले दिनों में प्रतिनिधि मंडल जिला मुख्यालय और फिर राजधानी जाकर अपनी समस्याओं और मांगों से शासन को अवगत कराएगा। हसदेव बांगो बांध से प्रभावित इन गांवों के मछुआरों की यह आवाज अब संगठित रूप ले चुकी है और आने वाले समय में यह संघर्ष क्षेत्रीय जनांदोलन का रूप भी ले सकता है।




