छत्तीसगढ़

छत्तीसगढ़ में खाद का महासंकट: सुशासन के दावों के बीच कालाबाजारी की मार झेलता अन्नदाता…

15 अगस्त विज्ञापन

(गौरी शंकर गुप्ता रायपुर/बिलासपुर। छत्तीसगढ़ में खरीफ फसल की बुवाई और रोपाई के ऐन वक्त पर खाद का संकट पूरी तरह विकराल रूप ले चुका है। सुशासन के दावों के बीच प्रदेश का अन्नदाता इस समय खाद की भयंकर किल्लत और बिचौलियों की बेलगाम कालाबाजारी की दोहरी मार झेलने को मजबूर है। राज्य की सहकारी समितियों के बाहर अहले सुबह से किसानों की किलोमीटर लंबी कतारें लग रही हैं, लेकिन घंटों इंतजार के बाद उन्हें खाली हाथ और निराशा लेकर घर लौटना पड़ रहा है। सोसाइटियों के बाहर ‘स्टॉक खत्म’ के बोर्ड लटका दिए गए हैं, जबकि इन्हीं समितियों से महज कुछ दूरी पर मौजूद निजी कृषि केंद्रों और बिचौलियों के अवैध गोदामों में खाद की कोई कमी नहीं है। सरकारी तंत्र की इस घोर अनदेखी का फायदा उठाकर कालाबाजारी करने वाले व्यापारी अब किसानों की लाचारी का खुलेआम आर्थिक शोषण कर रहे हैं।

​खाद की इस कृत्रिम किल्लत के बीच कीमतों का गणित पूरी तरह से बिगड़ चुका है। सरकार द्वारा तय की गई दरों की खुलेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। जिस नीम लेपित यूरिया की 45 किलोग्राम की बोरी का निर्धारित सरकारी मूल्य 266.50 रुपये है, उसे निजी व्यापारी 450 रुपये से लेकर 650 रुपये तक में धड़ल्ले से बेच रहे हैं। वहीं, खरीफ फसलों के लिए सबसे महत्वपूर्ण माने जाने वाले डीएपी (DAP) का हाल और भी बदतर है। 1,350 रुपये प्रति बोरी के सरकारी दाम वाले डीएपी के लिए किसानों से 1,900 रुपये से लेकर 2,200 रुपये तक वसूले जा रहे हैं। इसी तरह एनपीके और पोटाश (MOP) जैसी अन्य महत्वपूर्ण खादें भी बाजार से गायब कर दी गई हैं और उन्हें 400 से 600 रुपये प्रति बोरी के अतिरिक्त प्रीमियम पर बेचा जा रहा है। मजबूरी का आलम यह है कि बुवाई का समय निकला जा रहा है, इसलिए किसान अपनी जेब खाली करके भी महंगी खाद खरीदने पर मजबूर हैं।

​कालाबाजारी का यह खेल सिर्फ ऊंचे दामों तक सीमित नहीं है, बल्कि ‘जबरन टैगिंग’ के जरिए किसानों पर एक और हिडन चार्ज थोपा जा रहा है। निजी खाद विक्रेता यूरिया या डीएपी की हर एक बोरी के साथ अमानक कंपनियों के बायो-फर्टिलाइजर, जिंक, या अप्रয়োজনীয় टॉनिक के पैकेट जबरन बेच रहे हैं। इन अप्रत्यक्ष और घटिया उत्पादों की कीमत 400 से 600 रुपये तक होती है। यदि कोई किसान इन गैर-जरूरी सामानों को लेने से इनकार करता है, तो उसे सीधे तौर पर खाद देने से मना कर दिया जाता है। इस पूरी सांठगांठ के चलते यूरिया की एक बोरी किसान को औसतन 700 से 800 रुपये में पड़ रही है। सीमावर्ती जिलों में तो स्थिति और भी गंभीर है, जहां से खाद का एक बड़ा हिस्सा अवैध रूप से डंप कर पड़ोसी राज्यों में ऊंची कीमतों पर तस्करी किया जा रहा है।

​प्रशासनिक स्तर पर किए जा रहे दावों और जमीनी हकीकत में जमीन-आसमान का अंतर साफ नजर आ रहा है। कृषि विभाग हालांकि यह दावा कर रहा है कि उड़नदस्ता टीमें लगातार छापेमारी कर रही हैं, दुकानों को सील किया जा रहा है और नोटिस भेजे जा रहे हैं। लेकिन किसान संगठनों का आरोप है कि यह पूरी कार्रवाई केवल औपचारिकता और छोटे खुदरा दुकानदारों तक सीमित है। असली खेल रचने वाले बड़े थोक विक्रेताओं और रैक प्वाइंट्स के जमाखोरों पर शासन का कोई अंकुश नहीं है। समय पर उचित दाम पर खाद न मिलने से इस साल धान का उत्पादन बुरी तरह प्रभावित होने की आशंका बढ़ गई है, जिससे कर्ज लेकर खेती कर रहे किसानों के सामने अपनी आजीविका और परिवार के भविष्य को बचाने का एक बड़ा धर्मसंकट खड़ा हो गया है।

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