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छत्तीसगढ़ में दो साल बाद भी धरातल पर नहीं उतरा पांच शक्तिपीठों को जोड़ने का प्रस्ताव

15 अगस्त विज्ञापन


राज्य ब्यूरो, नईदुनिया.रायपुर। प्रदेश के पांच प्रमुख शक्तिपीठों को आपस में जोड़कर धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने की महत्वाकांक्षी योजना करीब दो वर्षों बाद भी धरातल पर नहीं उतर सकी है। यहां तक कि योजना के लिए अब तक कांसेप्ट प्लान रिपोर्ट (सीपीआर) भी तैयार नहीं हो पाई है।

जबकि, केंद्र सरकार ने वर्ष 2024 में ही उत्तराखंड की चारधाम परियोजना की तर्ज पर इस प्रस्ताव को मंजूरी दे दी थी।

धार्मिक सर्किट के रूप में विकसित किया जाना

इस परियोजना के तहत रतनपुर स्थित मां महामाया, चंद्रपुर की मां चंद्रहासनी, डोंगरगढ़ की मां बम्लेश्वरी, दंतेवाड़ा की मां दंतेश्वरी और सूरजपुर के कुदरगढ़ मंदिर को एक धार्मिक सर्किट के रूप में विकसित किया जाना था। विधानसभा चुनाव के दौरान भाजपा ने अपने घोषणा पत्र में शक्तिपीठ परियोजना का वादा किया था।

पांच करोड़ रुपये का प्रावधान भी किया गया था

सरकार गठन के बाद बजट में इसके लिए पांच करोड़ रुपये का प्रावधान भी किया गया था। परियोजना की कुल अनुमानित लागत 112 करोड़ रुपये बताई गई थी, जिससे प्रदेश में धार्मिक पर्यटन को नई दिशा मिलने की उम्मीद थी। पर्यटन व संस्कृति विभाग के अधिकारियों का कहना है कि सीपीआर तैयार करने की प्रक्रिया अब शुरू की गई है।

सीपीआर तैयार करने दो माह का समय दिया गया

इसके लिए 15 जनवरी को बोर्ड की अनुबंधित इंदौर की आर्टिटेक्स एजेंसी को पत्र जारी किया गया है। एजेंसी को डोंगरगढ़, कुदरगढ़, चंद्रपुर और दंतेवाड़ा की शक्तिपीठों के लिए सीपीआर तैयार करने दो माह का समय दिया गया है।

अब तक रिपोर्ट तैयार नहीं हो सकी

वहीं, रतनपुर स्थित मां महामाया मंदिर के लिए अलग से सीपीआर और डीपीआर तैयार करने का जिम्मा नई दिल्ली की एजेंसी को सौंपा गया है, जिसके लिए 21 मई 2025 को पत्र जारी किया गया था। इसके बावजूद अब तक रिपोर्ट तैयार नहीं हो सकी है।

यह सुविधाएं की जानी है विकसित

पांचों शक्तिपीठों में गार्डन, ठहने की व्यवस्था, लाइटिंग, हवन-पूजन स्थल, रेलिंग, पानी, सामुदायिक शौचालय, बैठने की व्यवस्था, रोप-वे, पर्यटन मंडल का केंद्र, सीसीटीवी कैमरा, सुरक्षा व्यवस्था और होम स्टे आदि की सुविधाएं विकसित की जानी है।

भगवान राम की मूर्ति लेकर अब तक नहीं लौटी टीम

भगवान श्रीराम की प्रतिमा लाने ग्वालियर गई टीम अब तक नहीं लौटी है। जबकि, करीब एक सप्ताह का समय बीत चुका है। भाजपा ने कांग्रेस शासनकाल में चंद्रखुरी में स्थापित भगवान श्रीराम की 51 फीट ऊंची प्रतिमा को लेकर आपति जताई थी और आरोप लगाया था कि महिमा के अनुसार झलक नजर नहीं आती है।

मुख्यमंत्री विष्णु देव साय को पत्र भी लिखा था

सरकार गठन के ढाई साल बाद भी मूर्ति स्थापित नहीं हो पाई थी। विगत वर्ष 20 नवंबर को भाजपा सासंद बृजमोहन अग्रवाल ने इस संबंध में मुख्यमंत्री विष्णु देव साय को पत्र भी लिखा था।

उन्होंने आग्रह किया था कि तीन महीनों के भीतर चंद्रखुरी में प्रभु श्रीराम की पारंपरिक स्वरूपानुकूल भव्य मूर्ति की स्थापना सुनिश्चित की जाए और मां कौशल्या की जन्मभूमि के समग्र विकास के लिए एक विस्तृत मास्टर प्लान बनाकर प्राथमिकता से कार्य शुरू किया जाए।

यह भी पढ़ें- बस्तर का धुड़मारास: जहां ठहरना भी एक यात्रा है… मिट्टी के घर, सितारों भरा आसमान और धुरवा जनजाति का अद्भुत आतिथ्य

सात दिनों में मूर्ति लगाने का दावा किया था

विधानसभा के शीतकालीन सत्र में विधायक अजय चंद्राकर ने भी नई मूर्ति का मामला उठाया था। तब पर्यटन व संस्कृति मंत्री राजेश अग्रवाल ने सात दिनों में मूर्ति लगाने का दावा किया था।

पांच प्रमुख शक्तिपीठों को आपस में जोड़कर धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने के प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। सीपीआर तैयार करने के लिए दो एजेंसियों को जिम्मेदारी दी गई है। भगवान श्रीराम की प्रतिमा लेकर जल्द ही टीम लौटेगी, जिसे शुभ मुहूर्त देखकर स्थापित किया जाएगा।

-विवेक आचार्य, एमडी, पर्यटन विभाग



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