
गौरीशंकर गुप्ता/रायगढ़/घरघोड़ा/होली, भारतीय संस्कृति का रंगीन त्योहार, प्राचीन काल से भक्ति, प्रेम और सामाजिक समरसता का प्रतीक रहा है। पुराणों में वर्णित होलिका दहन की कथा भक्ति की अग्नि को दर्शाती है, जहां प्रह्लाद की आस्था ने अधर्म को भस्म कर दिया। रामायण काल में श्रीराम द्वारा होलिका दहन का उल्लेख मिलता है, जो बुराई पर अच्छाई की विजय का संदेश देता है।
वसंत ऋतु के आगमन के साथ यह पर्व फसलोत्सव के रूप में भी मनाया जाता था, जहां गाँवों में सामूहिक नृत्य, भजन और रंगों का आदान-प्रदान सद्भाव का प्रतीक था। भक्ति साहित्य में सूरदास, मीरा और कबीर जैसे संतों ने होली को कृष्ण-राधा के दिव्य प्रेम से जोड़ा, जहाँ रंग भक्ति के भाव थे। मध्यकाल में राजा-महाराजाओं के दरबारों में होली का उत्सव संगीत और काव्य से सजा, लेकिन यह कभी हिंसा या अश्लीलता से दूर रहा।
आधुनिक युग में विकृति
आजादी के बाद शहरीकरण ने होली के स्वरूप को बदल दिया। पारंपरिक गुलाल और अबीर ने जगह ली रासायनिक रंगों, अंडों और कीचड़ ने। कलयुगी हुड़दंग अब होली का पर्याय बन गया है, जहाँ भीड़ में छेड़छाड़, मारपीट और नशे का सेवन आम हो गया। विशेषज्ञों के अनुसार, सोशल मीडिया ने इसे और प्रेरित किया, जहाँ ‘होली स्पेशल’ वीडियो वायरल करने की होड़ लगी।
महानगरों में सड़कों पर ट्रैफिक जाम, दुर्घटनाएँ और महिलाओं पर अत्याचार की घटनाएँ बढ़ीं। पुलिस आंकड़ों के मुताबिक, होली के दौरान अपराध 30 प्रतिशत तक उछल जाते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में भी अब जुआ, शराब और गुंडागर्दी ने जगह ले ली है। पर्यावरणीय दृष्टि से रासायनिक रंग जल प्रदूषण और त्वचा रोगों का कारण बन रहे हैं। UNESCO द्वारा अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर घोषित यह पर्व अब अपनी पहचान खो रहा।
परंपरा को पुनर्जनन की आवश्यकता
होली को बचाने के लिए सामूहिक प्रयास जरूरी। स्कूलों में बचपन से भक्ति भाव सिखाया जाए। ग्रीन होली को बढ़ावा देकर प्राकृतिक रंगों का उपयोग हो। सामुदायिक आयोजनों में भजन-कीर्तन पर जोर हो। प्रशासन सख्ती से हुड़दंग रोकें और जागरूकता अभियान चलाएँ।
सांस्कृतिक संगठन पारंपरिक नृत्य-नाटकों को पुनर्जीवित करें। अंततः होली भक्ति की अग्नि है, न कि हुड़दंग का बहाना। यदि हम न बदले तो यह यात्रा विनाश तक पहुँचेगी। आइए, होली को उसके मूल स्वरूप में लौटाएँ।




