राष्ट्रपति ने कहा:थाना-कचहरी में समय और पैसे खर्च होते हैं, छोटे विवाद गांव में ही बातचीत से सुलझाएं — ताजा अपडेट

बस्तर दशहरा की पहचान सिर्फ देवी-देवताओं की रस्मों और रथ-परिक्रमा तक सीमित नहीं है। इस उत्सव का एक अहम हिस्सा मुरिया दरबार भी है, जहां समाज अपनी समस्याओं पर चर्चा करता है। वह सामूहिक फैसलों की परंपरा निभाता है। इसी दरबार में शामिल हुईं राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने गांवों में विवादों के समाधान के लिए पारंपरिक व्यवस्था को मजबूत करने की अपील की। उन्होंने कहा कि छोटी-छोटी समस्याओं को लेकर थाना और कोर्ट-कचहरी जाने से समय और पैसा, दोनों खर्च होते हैं। बेहतर है कि समाज आपसी बातचीत से विवाद सुलझाने की कोशिश करे। राष्ट्रपति ने अपने पारिवारिक जुड़ाव का उल्लेख करते हुए कहा, मैं मांझी की बेटी हूं। मेरे दादा और पिता मांझी हुआ करते थे। मुझे इस परंपरा की जानकारी है। उन्होंने कहा कि शासन-व्यवस्थाएं समय के साथ बदली हैं। पहले राजा थे। फिर अंग्रेज आए। अब लोकतांत्रिक व्यवस्था है। आदिवासी समाज की अपनी परंपराएं और सामाजिक नियम आज भी उसकी पहचान हैं। उन्होंने कहा कि गांवों में मांझी, मुखिया और परगना बैठक कर समस्याओं पर चर्चा करते हैं। इस व्यवस्था में समाज के लोग मिलकर समाधान तलाशते हैं। राष्ट्रपति ने मुरिया दरबार को एक शक्तिशाली पारंपरिक व्यवस्था बताया। उन्होंने कहा कि इसे सम्मान देना जरूरी है। इसे आगे बढ़ाना भी जरूरी है। उन्होंने अपील की कि इस परंपरा को कभी बंद नहीं किया जाए। यह समाज में सुख-शांति, आनंद और भाईचारा बनाए रखने का माध्यम है। बस्तर दशहरा जोड़ता
है सभी समाजों को : लालबाग मैदान में आयोजित कार्यक्रम में राष्ट्रपति ने बस्तर दशहरा की सामूहिक भागीदारी को इसकी खासियत बताया। उन्होंने कहा कि अलग-अलग समाजों का आत्मीयता से एक साथ आना साधारण बात नहीं है। मुरिया दरबार जैसी परंपराएं जमीन से जुड़ी हैं। वे लोकतंत्र को मजबूत करती हैं। उन्होंने बस्तर की सांस्कृतिक पहचान और प्राकृतिक धरोहर को बचाए रखने का संदेश भी दिया। राष्ट्रपति ने दंडकारण्य और रामायण के प्रसंगों का उल्लेख करते हुए कहा कि बस्तर की अपनी सांस्कृतिक और धार्मिक महत्ता है। आदिवासी समाज पेड़-पौधों, मिट्टी और पत्थरों को पूजता है। जंगल जीवन, जल और भोजन का आधार हैं। इसलिए जंगल और पहाड़ों को बचाना सभी की जिम्मेदारी है। मांझी-परगना की व्यवस्था में सामूहिक फैसलों की परंपरा बस्तर के गांवों में मांझी, मुखिया और परगना सामाजिक समस्याओं पर बैठक कर चर्चा करते हैं। इस परंपरा का आधार आपसी संवाद और समाज की सहमति है। राष्ट्रपति ने इसे सामाजिक एकता की ताकत बताया। उन्होंने कहा कि इसे बनाए रखना जरूरी है। नई पीढ़ी अपनी पारंपरिक व्यवस्था और पहचान से जुड़ी रहे। बस्तर दशहरा में मुरिया दरबार की अहम भूमिका है। यह केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि समाज की भागीदारी, आपसी समझ और भाईचारे का प्रतीक है। राष्ट्रपति ने कहा कि इस तरह की परंपराएं समाज को जोड़ती हैं। इन्हें सहेजना जरूरी है। प्रकृति और जंगलों की रक्षा करना भी जरूरी है। मांझियों का मासिक मानदेय बढ़ाकर 5,000 किया सीएम विष्णुदेव साय ने माओवाद से प्रभावित क्षेत्रों में शांति के साथ विकास और पुनर्निर्माण को सरकार की प्राथमिकता बताया। सीएम ने पारंपरिक नेतृत्व के मानदेय में वृद्धि की घोषणा भी की। मांझियों का मासिक मानदेय 2,000 से बढ़ाकर 5,000 रुपए और चालकी का मानदेय 1,500 से बढ़ाकर 3,500 रुपए किया जाएगा।




