न्याय जगत में मचा आक्रोश: अंबिकापुर में अधिवक्ता से मारपीट पर पुलिस घिरी सवालों में
Outrage in the judicial world: Police face questions over assault on lawyer in Ambikapur

अंबिकापुर : अंबिकापुर के गांधीनगर थाना क्षेत्र में वरिष्ठ अधिवक्ता राजेश तिवारी और उनके परिवार के साथ हुई मारपीट की घटना ने पूरे न्यायिक समुदाय को हिला कर रख दिया है। घटना के अनुसार, एक सामान्य सी बात पर पुलिस के प्रधान आरक्षक संतोष कश्यप ने अधिवक्ता के बेटे राहुल तिवारी को उस समय पीटना शुरू कर दिया जब वह कार को घर के सामने खड़ा कर रहा था।
इस दौरान जब राहुल ने अपने पिता और मां को स्थिति की सूचना दी, तो वे दोनों मौके पर पहुंचे। लेकिन पुलिसकर्मी ने इसके बाद राजेश तिवारी, उनकी पत्नी संध्या तिवारी और बेटे राहुल सहित पूरे परिवार के साथ अभद्रता और मारपीट की, जिससे वे गंभीर रूप से घायल हो गए। अधिवक्ता राजेश तिवारी का पैर तक फ्रैक्चर हो गया है। इस घटना ने न केवल एक परिवार को अपमानित किया, बल्कि न्याय व्यवस्था की गरिमा को भी ठेस पहुंचाई है।
घटना की जानकारी मिलते ही, अंबिकापुर अधिवक्ता संघ और सरगुजा क्षेत्र के अधिवक्ता समुदाय ने इस घटना की कड़ी निंदा की है। उन्होंने इसे पुलिस की अमर्यादित गुंडागर्दी और अधिवक्ताओं की प्रतिष्ठा पर सीधा प्रहार बताया। सोमवार को एक आपात बैठक बुलाई गई, जिसमें वरिष्ठ और कनिष्ठ अधिवक्ताओं ने हिस्सा लिया। सभी ने इस घटना को न्यायिक संस्थान और कानून व्यवस्था के लिए खतरनाक बताया और दोषी पुलिस कर्मियों के खिलाफ तुरंत सख्त कार्रवाई की मांग की। संघ ने पुलिस के इस रवैए को न्यायिक व्यवस्था के खिलाफ बड़ा हमला करार दिया। इसके साथ ही कई सामाजिक एवं राजनीतिक संगठन भी इस मामले में अधिवक्ताओं के समर्थन में सामने आए हैं।
प्रशासन ने मामले की गंभीरता को देखते हुए तत्काल प्रभाव से प्रधान आरक्षक संतोष कश्यप को लाइन अटैच कर दिया है और जांच समिति गठित की है। पुलिस अधीक्षक राजेश अग्रवाल ने भी यह आश्वासन दिया है कि दोषियों के खिलाफ कड़ी से कड़ी कार्रवाई की जाएगी। हालांकि, अधिवक्ताओं और सामाजिक संगठन अभी भी संतुष्ट नहीं हैं और मांग कर रहे हैं कि इस मामले में सभी आरोपी पुलिस कर्मियों को दंडित किया जाए। उनका कहना है कि केवल निलंबन या लाइन अटैच से न्याय नहीं होगा। उन्होंने पुलिस प्रणाली पर सवाल उठाते हुए कहा कि आम नागरिकों को तो पुलिस से संरक्षण नहीं मिलता, लेकिन वर्दीधारी लोग खुद गुंडागर्दी कर रहे हैं।
यह घटना न केवल अधिवक्ता समुदाय तक सीमित रह गई, बल्कि स्थानीय ब्राह्मण समाज और अन्य सामाजिक संगठनों ने भी इसे गंभीरता से लिया है। सर्व ब्राह्मण समाज ने पुलिस अधीक्षक के कार्यालय में ज्ञापन सौंपकर दोषियों की गिरफ्तारी की मांग की है। उन्होंने चेतावनी दी है कि यदि जल्द ही कार्रवाई नहीं हुई तो बड़े स्तर पर प्रदर्शन किया जाएगा। स्थानीय विधायक अंकुर राज तिवारी ने भी पीड़ित परिवार से मिलकर उनसे समर्थन व्यक्त किया है और मामले की न्यायसंगत सुनवाई के लिए मंच तैयार किया है। इस प्रक्रिया में राजनीतिक और सामाजिक दबाव दोनों ही क्षेत्र में बढ़ रहे हैं ताकि न्याय सुनिश्चित किया जा सके।
न्याय व्यवस्था की गरिमा पर प्रभाव
कानून के रक्षक यानी अधिवक्ताओं के प्रति इस तरह का व्यवहार पूरे न्यायिक ढांचे पर प्रश्नचिन्ह लगाता है। अधिवक्ताओं का कहना है कि यदि वे खुद सुरक्षित नहीं रह सकेंगे तो आम नागरिकों की न्यायिक सुरक्षा की उम्मीद कैसे की जा सकती है। इस तरह की घटना से न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता पर संकट उत्पन्न होता है। विशेषज्ञ और अधिवक्ता संगठन इस घटना को न केवल एक व्यक्तिगत आघात मानते हैं, बल्कि इसे न्याय व्यवस्था की स्वतंत्रता और गरिमा पर हमला भी करार देते हैं। उन्होंने सरकार और प्रशासन से इस प्रकार की कार्रवाइयों को रोकने के लिए ठोस कदम उठाने की मांग की है।
अंबिकापुर के इस घटना ने समाज में कानून व्यवस्था, पुलिस की भूमिका और न्यायिक प्रतिष्ठा के बारे में गहरा सवाल खड़ा कर दिया है। वरिष्ठ अधिवक्ता राजेश तिवारी और उनके परिवार के साथ हुई मारपीट को लेकर अधिवक्ता संघ, सामाजिक संगठन और स्थानीय जनमानस ने मिलकर कड़ा विरोध जताया है। पुलिस प्रशासन पर भी इस मामले में जवाबदेही तय करने का दबाव बढ़ा है। यह घटना न्याय व्यवस्था के प्रति जागरूकता बढ़ाने के साथ-साथ प्रशासनिक सुधार की भी आवश्यकता को रेखांकित करती है, ताकि भविष्य में इस प्रकार की घटनाओं को रोका जा सके और न्यायिक संस्थान की प्रतिष्ठा बनी रहे।




