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नक्सल भय का अंत, अबूझमाड़ में फिर जीवंत हुई ‘घोटुल’ की गौरवशाली परंपरा

15 अगस्त विज्ञापन

​रायपुर,  अगस्त 2026/ बस्तर संभाग के नारायणपुर जिले के​ अबूझमाड़ क्षेत्र में घोटुल परंपरा आदिवासी संस्कृति, अनुशासन और सामाजिक शिक्षा का एक अनूठा और जीवंत केंद्र है। अब अबूझमाड़ के अंदरूनी गांवों (जैसे झारावाही) में ग्रामीण अपनी प्राचीन संस्कृति को सहेजने के लिए स्थानीय लकड़ियों और प्राकृतिक सामग्रियों से दोबारा पारंपरिक घोटुल तैयार कर रहे हैं। बुजुर्गों द्वारा युवाओं को समाज के नियम, परंपराएं, संगीत, नृत्य और जीवनोपयोगी दायित्व सिखाए जाते हैं।

‘चेलिक-मोटियारिन’ के सुरीले लोकगीत गूंजने लगे हैं

अबूझमाड़ की शाम अब भय के साये से मुक्त होकर अपनी पौराणिक और सांस्कृतिक लय में लौटने लगी हैं। जिस अंचल में कभी गोलियों की तड़तड़ाहट और सन्नाटे का खौफ हुआ करता था, वहां अब सूर्य ढलते ही मांदर की थाप और ‘चेलिक-मोटियारिन’ के सुरीले लोकगीत गूंजने लगे हैं। सुरक्षा वातावरण में आए सकारात्मक बदलाव के साथ ही आदिवासी समाज की ऐतिहासिक धरोहर ‘घोटुल’ की रौनक फिर से लौट आई है।

युवा बेझिझक घोटुल पहुंच रहे हैं

​घोटुल केवल एक सामाजिक केंद्र नहीं, बल्कि आदिवासी समाज की संस्कृति, अनुशासन, लोककला और सामुदायिक मूल्यों की महत्वपूर्ण जीवन-पाठशाला है। नक्सली हिंसा और अनिश्चितता के दौर में गांव वाले शाम ढलते ही अपने घरों में दुबकने को मजबूर थे, जिससे घोटुल की गतिविधियां लगभग थम सी गई थीं। ​सुरक्षा बलों के प्रभावी अभियानों और नक्सल प्रभाव में आई कमी के बाद ग्रामीणों में सुरक्षा का भाव मजबूत हुआ है। अब युवा बेझिझक घोटुल पहुंच रहे हैं, जहां वे अपने बुजुर्गों से लोक परंपराएं, नृत्य और गीत सीखकर अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं।

घोटुलों से आती मांदर की थाप परंपराएं और सामूहिक उल्लास जीवंत गवाही दे रही है

​ घोटुलों का पुनर्जीवन केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि अबूझमाड़ के सांस्कृतिक अस्तित्व और आत्मसम्मान की वापसी का प्रतीक है। सुरक्षा व्यवस्था सुदृढ़ होने से ग्रामीणों की आवाजाही, खेती-किसानी, हाट-बाजार और त्योहारों का उत्साह फिर से लौट आया है। ग्रामीणों का मानना है कि इस शांति को स्थायी बनाने के लिए अब शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क कनेक्टिविटी, रोजगार और संचार सुविधाओं का विस्तार अत्यंत आवश्यक है। घोटुलों से आती मांदर की थाप इस बात की जीवंत गवाही दे रही है कि जब डर का अंधेरा छंटता है, तो परंपराएं और सामूहिक उल्लास अपने आप मुस्कुरा उठते हैं।

15 अगस्त विज्ञापन
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