
(गौरी शंकर गुप्ता) रायगढ़। जिले के लैलूंगा थाना क्षेत्र में 17 वर्षीय नाबालिग के अपहरण, बंधक बनाकर शोषण, 3 माह के गर्भ और फिर घर में घुसकर पिता से मारपीट कर दोबारा अगवा करने के मामले ने अब अत्यंत उग्र रूप ले लिया है। इस पूरे प्रकरण में केवल मुख्य आरोपी निखिल मांझी ही नहीं, बल्कि थाने के भीतर बैठकर गैरकानूनी समझौता कराने वाले लैलूंगा थाना प्रभारी और स्थानीय दलालों का पूरा सिंडिकेट सीधे तौर पर जनता और कानून के निशाने पर आ गया है। पीड़ित परिवार और सामाजिक संगठनों ने अब दो-टूक मांग की है कि कर्तव्य में घोर लापरवाही, साक्ष्य छिपाने, पॉक्सो एक्ट की अनदेखी करने और रिश्वतखोरी के आरोप में लैलूंगा थाना प्रभारी सहित समझौते में शामिल सभी बिचौलियों के खिलाफ नामजद एफआईआर (FIR) दर्ज कर मामले की उच्च स्तरीय (IG/CID स्तर की) निष्पक्ष जांच कराई जाए।
थानेदार और दलालों के गठजोड़ पर सीधे FIR दर्ज करने के विधिक आधार:
* कानून विशेषज्ञों और जनअधिकार कार्यकर्ताओं के अनुसार, इस पूरे कांड में खाकी और बिचौलियों की भूमिका महज लापरवाही की नहीं, बल्कि सीधे तौर पर संगठित अपराध को संरक्षण देने की है:
* POCSO Act की धारा 19 व 21 का खुला उल्लंघन: पॉक्सो कानून के तहत किसी भी नाबालिग के साथ हुए अपराध की सूचना मिलने पर एफआईआर दर्ज करना अनिवार्य है। इसे दबाना या समझौता कराना संज्ञेय और गैर-जमानती अपराध है, जिसके तहत लैलूंगा थाना प्रभारी पर सीधी FIR बनती है।
* आपराधिक षड्यंत्र (BNS धारा 61 / IPC 120B): थाने के चैंबर में बैठकर अपराध को रफा-दफा करने का दबाव बनाने वाले दलाल— पाला बाई, धर्मेंद्र बंगाली, घनश्याम बेहरा और भुवनेश्वर चौहान— पर मुख्य आरोपी को बचाने और साक्ष्य मिटाने की साजिश रचने के तहत तत्काल सह-आरोपी बनाकर मुकदमा दर्ज होना चाहिए।
* भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम व पद का दुरुपयोग: परिजनों द्वारा कैमरे पर लगाए गए ₹50,000 की रिश्वत के आरोप और नामजद आरोपी निखिल मांझी को एफआईआर में ‘अज्ञात’ लिखने के कृत्य की एंटी-करप्शन ब्यूरो (ACB) और विजिलेंस से जांच कराकर टीआई पर केस दर्ज किया जाना चाहिए।
मांग के 4 प्रमुख बिंदु : सिस्टम को आर-पार की चेतावनी
* लैलूंगा टीआई का तत्काल निलंबन व FIR: थानेदार को अविलंब पद से हटाते हुए पॉक्सो एक्ट की अवहेलना, लोक सेवक द्वारा गलत रिकॉर्ड तैयार करने (धारा 166/167 IPC या BNS समकक्ष) और भ्रष्टाचार के तहत मामला दर्ज किया जाए।
* सुलह कराने वाले दलालों की गिरफ्तारी: थाने में बैठकर ‘खर्चा-पानी’ का प्रलोभन देने और पीड़ित परिवार को धमकाने वाले सभी बिचौलियों को गिरफ्तार कर सलाखों के पीछे भेजा जाए।
* उच्च स्तरीय विशेष जांच दल (SIT/CID) का गठन: लैलूंगा पुलिस पर से जनता का भरोसा पूरी तरह उठ चुका है, इसलिए रायगढ़ एसपी और बिलासपुर रेंज आईजी तत्काल एक स्वतंत्र जांच दल गठित करें जो सीधे उच्चाधिकारियों की निगरानी में काम करे।
* गर्भवती किशोरी की सकुशल बरामदगी: 3 माह के गर्भ के साथ दोबारा अगवा की गई नाबालिग को तत्काल विशेष पुलिस टीम बनाकर सकुशल बरामद किया जाए और आरोपी निखिल मांझी को गैर-जमानती धाराओं में जेल भेजा जाए।
*”गरीबों के लिए कानून अलग और रसूखदारों के लिए अलग नहीं हो सकता”*
पीड़ित परिवार ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि पुलिस प्रशासन ने अपने ही भ्रष्ट अधिकारियों और दलालों को बचाने की कोशिश की, तो यह मामला केवल थाने तक सीमित नहीं रहेगा। परिवार ने न्याय न मिलने की स्थिति में पुलिस अधीक्षक कार्यालय रायगढ़ के समक्ष आमरण अनशन और उच्च न्यायालय (High Court) का दरवाजा खटखटाने का फैसला किया है।
अब देखना यह होगा कि रायगढ़ पुलिस के उच्चाधिकारी अपनी ही वर्दी पर लगे इस गहरे दाग को धोने के लिए लैलूंगा थानेदार और दलालों के सिंडिकेट पर एफआईआर दर्ज करने की हिम्मत जुटा पाते हैं या फिर ‘सुशासन’ का नारा फाइलों में ही दबा रह जाएगा।




