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खरपतवार, कीड़े-बीमारी, इनसे जीते तो 25-30% पैदावार बढ़ना तय: विशेषज्ञ की सलाह- उपाय नहीं किया तो नुकसान तय, फसल के शुरुआती 20-30 दिन सबसे नाजुक – Raipur News

15 अगस्त विज्ञापन




खेती में लागत लगाना और दिन-रात मेहनत करना तब तक अधूरा है, जब तक कि आप अपनी फसल के असली दुश्मनों को पहचान न लें। हर साल 25 से 40% फसल इसलिए बर्बाद हो जाती है, क्योंकि किसान सही समय पर यह नहीं समझ पाते कि फसल पर कीट का हमला हुआ है, किसी बीमारी ने पैर पसारे हैं या फिर खरपतवार उनका हक छीन रहे हैं। समय पर रोग का प्रबंधन करने से 25 से 30 प्रतिशत तक पैदावार बढ़ा सकते हैं। फसल के शुरुआती 20 से 30 दिन नाजुक समय होते हैं। इस दौरान यदि खेतों में खरपतवार हावी हो गए, तो वे मुख्य फसल के हिस्से का सारा पोषक तत्व, खाद, धूप और जमीन की नमी छीन लेते हैं। नतीजा यह कि मुख्य पौधा कुपोषित रह जाता है। ग्रोथ रुक जाती है। धान के साथ मक्का, कोदो, कुटकी, रागी, दलहन और तिलहन फसल की पैदावार बढ़ाने सर्तकता जरूरी है। कोई भी दवा खरीदने से पहले नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र या मोबाइल ऐप के जरिए लक्षण दिखाकर सही पहचान कर लें। गलत दवा डालने से न सिर्फ पैसा बर्बाद होता है, बल्कि मित्र कीट जैसे केंचुआ और लेडीबर्ड बीटल भी मारे जाते हैं। फसल के तीनों दुश्मनों की पहचान इस तरह करिए… कीट: इल्ली या टिड्डी, जो पत्तियां चबा जाते हैं। माहो या सफेद मक्खी पौधों का रस चूसकर कमजोर कर देते हैं।
पहचान: पत्तियों पर छोटे-छोटे छेद, पीछे छोटे-छोटे कीड़ों का जमावड़ा। रस चूसने वाले कीटों से पत्तियां पीली, मुड़ने लगती हैं।
बचाव: नीम का तेल का छिड़काव। कीटों के ज्यादा फैलने पर ही कृषि विशेषज्ञ की सलाह से कीटनाशक का इस्तेमाल करें।
धान के लिए दवा: तना छेदक के लिए कर्टाप हाइड्रोक्लोराइड डब्लू पी1 किलो हे., फटेरा, फटे गोल्ड लिपिडोज, माहू के लिए पाइमेट्रोजिन 50 डब्लू जी 300 ग्राम प्रति हेक्टेयर, पेनीकल माइट के लिए हेक्थायजोक्स 5.45 ईसी प्रति हेक्टेयर 500 मिमी। रोग: फंगस, बैक्टीरिया या वायरस की वजह से होता है। यह हवा, पानी या दूषित बीजों से फैलता है।
पहचान: पत्तों या तनों पर भूरे, काले या पीले रंग के धब्बे पड़ना। पौधों का सूखना या पत्तों पर सफेद पाउडर जैसा जमा होना।
बचाव: हमेशा प्रमाणित और उपचारित बीजों की ही बुवाई करें। बीमारी के लक्षण दिखते ही प्रभावित पौधों को उखाड़कर खेत से दूर नष्ट कर दें और जरूरत के अनुसार फफूंदनाशक का छिड़काव करें।
दवा का उपयोग: धान, कोदो-कुटकी में झुलसा रोग के लिए नाटीवो 75 डब्लू की 0.4 ग्राम प्रति लीटर, ट्राईसाइक्लजोल काव़कना सी 6 ग्राम प्रति लीटर 12 से 18 दिन के अंतर में छिड़काव करें। खरपतवार: चुपके से फसल का हक मारने वाले अनचाहे पौधे जो मुख्य फसल के साथ अपने आप उग आते हैं। ये जमीन से पोषक तत्व, पानी और धूप को खुद सोख लेते हैं, जिससे फसल कुपोषित रह जाती है।
पहचान: मुख्य फसल के अलावा उगने वाली घास, जैसे मोथा, बथुआ या गाजरघास।
बचाव: बुवाई के 20-25 दिन और फिर 40-45 दिन बाद निराई-गुड़ाई जरूरी। स्वच्छ एवं प्रमाणित बीज का उपयोग करें। खेत के मेड़ों और आसपास की सफाई रखें।
खरपतवारनाशी: धान के लिए आक्साडायजान 250 ग्राम हेक्टेयर की दर से बुवाई के 3 दिन के भीतर डालें। आक्सीफ्लोरफेन 100 से 125 ग्राम प्रति हेक्टेयर, पेंडीमेथालान 750 ग्राम प्रति हेक्टेयर दवा छिड़कें। नॉमिनी गोल्ड, एडोरा को बुवाई के 20 25 दिन में डालें। खरपतवार, रोग नियंत्रण से बढ़ी उपज कोरबा जिले के करतला ब्लॉक के रामपुर के किसान रोहित कुमार राठिया बताते हैं कि वे हर साल मानसून के पहले 13 किलो प्रति एकड़ बीज का छिड़काव करते हैं, जिसमें दलहन, तिलहन और मिलेट्स के 18 प्रकार के बीज शामिल होते हैं। उगने के 1 महीने बाद जुताई कर देते हैं। इससे खरपतवार नष्ट होने के साथ जमीन की उर्वरता शक्ति बढ़ती है। इससे रोग भी नहीं लगते हैं। जमीन की रोग प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ रही है। इससे 20 प्रतिशत तक पैदावार बढ़ गई है।



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