Uncategorized

Bastar के जंगलों में फिर लौटी परंपराओं की महक, गगनपल्ली में दादी-नानी से लोकज्ञान सीख रही नई पीढ़ी

15 अगस्त विज्ञापन


सुकमा जिले के गगनपल्ली गांव में इन दिनों माओवादी हिंसा के खात्मे के बाद पीढ़ियों के बीच ज्ञान के हस्तांतरण का एक सुंदर दृश्य दिख रहा है। ‘दादी-नानी की …और पढ़ें

By Paritosh DubeyEdited By: Paritosh Dubey

Publish Date: Tue, 09 Jun 2026 12:35:23 PM (IST)Updated Date: Tue, 09 Jun 2026 12:35:23 PM (IST)

बस्तर में वनोपज संग्रह के गुर सीखती नई पीढ़ी। नईदुनिया

नईदुनिया प्रतिनिधि, सुकमा । छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले के कोंटा ब्लॉक से लगभग 25 किलोमीटर दूर स्थित आदिवासी बहुल गगनपल्ली गांव इन दिनों बस्तर में आ रहे एक शांत और बेहद गहरे सांस्कृतिक व सामाजिक बदलाव का गवाह बन रहा है। कभी इस पूरे सुदूर इलाके में गोलियों और बारूदी धमाकों की आवाज सुनते ही डरे-सहमे ग्रामीणों के घरों के दरवाजे बंद हो जाया करते थे और जंगलों की ओर जाने वाले रास्तों पर मौत का साया चलता था। लेकिन आज माओवादी हिंसा के खात्मे के बाद परिस्थितियां पूरी तरह बदल चुकी हैं। अब बस्तर की नई पीढ़ी अपने बुजुर्गों के हाथ पकड़कर जंगलों में निडर होकर घूम रही है और जंगल को किसी डर के रूप में नहीं, बल्कि जीवन और आजीविका के मुख्य आधार के रूप में समझ रही है।

महुआ और टोरा की सोंधी महक घुली

गगनपल्ली गांव की सड़कों पर इन दिनों महुआ और टोरा (साल के बीज) की सोंधी महक घुली हुई है। यहाँ गांव की 70 वर्षीय बुजुर्ग महिला पोड़ियामी चंद्री एक बड़े पत्थर पर बैठकर अपनी नन्हीं पोती को टोरा के फलों का कड़ा छिलका निकालने की पारंपरिक विधि बहुत प्यार से सिखा रही हैं। यह दृश्य केवल किसी वनोपज के प्रसंस्करण का नहीं है, बल्कि आदिवासी समाज की उस मौखिक विरासत, लोकज्ञान और पहचान के हस्तांतरण का है जो पीढ़ियों से चली आ रही है। लगभग 370 परिवारों और 1400 की आबादी वाले इस दोरला आदिवासी गांव में आजकल स्कूलों की गर्मियों की छुट्टियां चल रही हैं, और बच्चे मोबाइल की आभासी दुनिया से दूर जंगल की अनौपचारिक पाठशाला में व्यस्त हैं।

मौसम आधारित फलों और वनोपज की जानकारी

वे अपने दादा-दादी से सीख रहे हैं कि किस मौसम में कौन सा फल मिलता है, किस बीज से औषधीय तेल निकाला जाता है और जंगल को क्यों माँ का दर्जा दिया गया है। आदिवासी समाज में महुआ, तेंदूपत्ता और टोरा केवल आजीविका का साधन नहीं, बल्कि उनकी संस्कृति का अभिन्न हिस्सा हैं। लंबे समय तक चली हिंसा के दौर ने नई पीढ़ी और बुजुर्गों के बीच की इस लोकज्ञान की कड़ी को तोड़ दिया था, क्योंकि माता-पिता बच्चों को जंगल ले जाने से डरते थे। अब जब शांति बहाल हुई है, तो गगनपल्ली की यह चौपाल बताती है कि बस्तर में न केवल बंदूकें खामोश हुई हैं, बल्कि वह बिछुड़ी हुई विरासत और सांस्कृतिक पुनर्जागरण भी वापस लौट आया है जो बस्तर की असली आत्मा है।



Source link

15 अगस्त विज्ञापन
विज्ञापन 1
विज्ञापन 2
विज्ञापन 3
विज्ञापन 4
विज्ञापन 5
विज्ञापन 6
विज्ञापन 7
विज्ञापन 8

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!