अंबिकापुर नगर निगम के पूर्व महापौर व 21 पार्षदों के 1.43 करोड़ मानदेय भुगतान पर हाईकोर्ट ने दिए त्वरित निपटारे के निर्देश
The High Court has directed the expeditious settlement of the Rs 1.43 crore honorarium payment for the former mayor and 21 councilors of Ambikapur Municipal Corporation

अंबिकापुर : अंबिकापुर नगर निगम के पूर्व महापौर और 21 पार्षदों के लंबित मानदेय के मामले में छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने महत्वपूर्ण हस्तक्षेप करते हुए त्वरित निपटारे के निर्देश दिए हैं। जून 2023 से बकाया चल रहे लगभग 1.43 करोड़ रुपये के मानदेय भुगतान को लेकर पूर्व जनप्रतिनिधियों ने अदालत की शरण ली थी, जिस पर सुनवाई करते हुए न्यायालय ने नगर प्रशासन और राज्य सरकार दोनों को स्पष्ट दिशा‑निर्देश जारी किए।
नगर निगम अंबिकापुर की 2019‑2025 की परिषद के कार्यकाल के दौरान जून 2023 के बाद से पूर्व महापौर और पार्षदों को मानदेय का नियमित भुगतान नहीं हो रहा था। बताया जाता है कि निगम परिषद के भंग होने और नई परिषद के गठन की प्रक्रियाओं के बीच वित्तीय स्वीकृतियों में विलंब के कारण मानदेय भुगतान लंबित होता चला गया। पूर्व महापौर सहित 21 पार्षदों के अनुसार कई बार लिखित और मौखिक रूप से निगम प्रशासन को अवगत कराने के बाद भी स्थिति में सुधार नहीं हुआ।
लगातार देरी से आक्रोशित पूर्व जनप्रतिनिधियों ने इसे अपने संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन बताते हुए उच्च न्यायालय में याचिका दायर की। याचिका में कहा गया कि निर्वाचित प्रतिनिधियों को दिया जाने वाला मानदेय उनके जनसेवा कार्यों के लिए आवश्यक है और इसे अनिश्चितकाल तक रोकना न तो कानूनसंगत है और न ही नैतिक रूप से उचित।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता पक्ष ने तर्क दिया कि निगम के पास अन्य मदों में व्यय के लिए संसाधन उपलब्ध हैं, लेकिन पूर्व जनप्रतिनिधियों के प्रति राजनीतिक भेदभाव के कारण मानदेय रोका गया। दूसरी ओर, निगम और शासन की ओर से वित्तीय संकट, बजट अनुमोदन में देरी और तकनीकी प्रक्रियाओं का हवाला दिया गया।
अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद टिप्पणी की कि लोकतांत्रिक ढांचे में चुने हुए प्रतिनिधियों का मानदेय केवल औपचारिक भुगतान नहीं, बल्कि संस्थागत गरिमा और सुचारु प्रशासन से जुड़ा विषय है। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि निगम के पास वित्तीय संसाधन सीमित हैं, तब भी वेतन और मानदेय जैसी प्राथमिक देनदारियों को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
त्वरित निपटारे के लिए अदालत के निर्देश
न्यायालय ने आदेश दिया कि अंबिकापुर नगर निगम और राज्य सरकार बकाया मानदेय की संपूर्ण राशि के भुगतान के लिए एक स्पष्ट रोडमैप तैयार करें। अदालत ने निर्देश दिया कि निर्धारित समयावधि के भीतर पूर्व महापौर और सभी 21 पार्षदों के मानदेय की गणना पूरी कर भुगतान की कार्यवाही शुरू की जाए। साथ ही, भुगतान की प्रगति रिपोर्ट अदालत में प्रस्तुत करने को भी कहा गया, ताकि अनुपालन की निगरानी संभव हो सके।
इसके अलावा, अदालत ने यह भी संकेत दिया कि यदि दिए गए निर्देशों का समय पर पालन नहीं किया गया, तो संबंधित अधिकारियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई, यहां तक कि अवमानना की कार्यवाही भी की जा सकती है। इस चेतावनी के बाद नगर निगम प्रशासन और संबंधित विभागों में हलचल तेज हो गई है और फाइलों को तेजी से आगे बढ़ाए जाने की खबरें सामने आ रही हैं।
हाईकोर्ट के आदेश के बाद नगर निगम पर सबसे बड़ी जिम्मेदारी यह है कि वह बकाया मानदेय की सही‑सही गणना कर तत्काल वित्तीय प्रबंध सुनिश्चित करे। इसके लिए निगम को अपने साधन‑स्रोत, राज्य से मिलने वाले अनुदान, तथा अन्य राजस्व मदों की समीक्षा कर प्राथमिकता के आधार पर राशि उपलब्ध करानी होगी। प्रशासनिक स्तर पर यह भी अपेक्षा की जा रही है कि आगे से बजट प्रावधान, परिषद भंग होने की स्थिति और चुनावी आचार संहिता जैसी परिस्थितियों में भी मानदेय भुगतान की स्पष्ट व्यवस्था बनाई जाए।
राज्य सरकार के लिए यह प्रकरण संकेत है कि नगर निकायों के वित्तीय प्रबंधन और निगरानी की वर्तमान व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता है। यदि किसी निकाय में इस तरह की स्थिति बनती है तो समय रहते हस्तक्षेप कर समाधान निकालना शासन की जिम्मेदारी है, ताकि न्यायालय का समय भी बच सके और जनप्रतिनिधियों को न्याय के लिए लंबा इंतज़ार न करना पड़े।
लंबित मानदेय का मुद्दा पिछले कई महीनों से स्थानीय राजनीति में बहस का विषय रहा है। पूर्व महापौर और पार्षदों ने इसे वर्तमान शासन द्वारा राजनीतिक द्वेष का परिणाम बताया, जबकि सत्तापक्ष ने पूर्व परिषद पर वित्तीय अनियमितताओं के आरोप लगाते हुए मानदेय रुकने को तकनीकी मजबूरी बताया। उच्च न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद अब दोनों पक्षों पर दबाव है कि वे परस्पर आरोप‑प्रत्यारोप छोड़ कर कानूनी निर्देशों के मुताबिक व्यवहारिक समाधान पर ध्यान दें।
जनप्रतिनिधियों के संगठनों और कर्मचारी संघों ने अदालत के आदेश का स्वागत करते हुए इसे लोकतांत्रिक संस्थाओं की मजबूती की दिशा में सकारात्मक कदम बताया है। आम नागरिकों के बीच भी यह संदेश गया है कि यदि वैधानिक अधिकारों की अनदेखी की जाती है तो न्यायपालिका उसके संरक्षण के लिए खड़ी हो सकती है।
अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि नगर निगम और राज्य सरकार अदालत द्वारा तय समयसीमा के भीतर भुगतान प्रक्रिया पूरी कर पाते हैं या नहीं। यदि बकाया मानदेय शीघ्र जारी हो जाता है तो न केवल पूर्व महापौर और पार्षदों को राहत मिलेगी, बल्कि नगर निगम की साख भी कुछ हद तक बहाल होगी।




