अबूझमाड़ की अनोखी परंपरा: देवगुड़ी और आंगा देव, जहां प्रकृति और आस्था का संगम
छत्तीसगढ़ के बस्तर अंचल का अबूझमाड़ क्षेत्र अपनी घनी झाड़ियों, दुर्गम पहाड़ियों और अनछुए भूगोल के लिए जाना जाता है। यहां की माड़िया और मुड़िया जनजातियां प्रकृति के साथ जिस अद्भुत तालमेल में रहती हैं, उसका सबसे सुंदर उदाहरण ‘देवगुड़ी’ में देखने को मिलता है। कंक्रीट के बड़े-बड़े ढांचों और भव्य मूर्तियों से दूर, यह परंपरा प्रकृति संरक्षण और भक्ति की दुनिया का सबसे अनोखा उदाहरण है।
अबूझमाड़ की सबसे अनोखी परंपरा ‘आंगा देव’ की रचना है। जब गांव पर कोई संकट आता है या नए देवता की स्थापना होती है, तो आदिवासी जंगल से बीजा या सरई के पेड़ की पवित्र लकड़ी चुनते हैं। तीन-चार लकड़ियों को बांधकर एक पालकी जैसी आकृति बनाई जाती है। पूजा-अनुष्ठान के बाद माना जाता है कि इसमें ‘प्राण’ बस गए हैं। त्योहारों के दौरान दो लोग इसे कंधों पर उठाते हैं और मान्यता है कि आंगा देव स्वयं चलकर गांव के फैसलों का मार्गदर्शन करते हैं।
आदिवासियों की यह आस्था पूरी तरह से पर्यावरण और पारिस्थितिकी से जुड़ी हुई है। देवगुड़ी की व्यवस्था गांव के दो प्रमुख लोग संभालते हैं।
आधुनिकता के बढ़ते प्रभाव के बीच छत्तीसगढ़ सरकार ने इन पारंपरिक धरोहरों को सहेजने के लिए ‘देवगुड़ी संरक्षण योजना’ शुरू की है। इसके तहत देवगुड़ी के मूल और प्राकृतिक स्वरूप से छेड़छाड़ किए बिना बाउंड्री और पीने के पानी जैसी बुनियादी सुविधाएं मुहैया कराई जा रही हैं।
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