रायपुर आए डीडीजी मयंक श्रीवास्तव से विशेष बातचीत: श्रीवास्तव ने कहा – इवेंट से ज्यादा सिस्टम पर जोर, आदिवासी क्षेत्र की प्रतिभाओं को मिलेगी इंटरनेशनल पहचान – Raipur News

देश में स्पोर्ट्स डेवलपमेंट अब इवेंट-ड्रिवन नहीं, बल्कि सिस्टम-ड्रिवन मॉडल की ओर बढ़ रहा है। ‘खेलो इंडिया’ का उद्देश्य ऐसी सस्टेनेबल पाइपलाइन तैयार करना है, जो ग्रासरूट स्तर से प्रतिभा को पहचानकर एलीट लेवल तक पहुंचाए। यह बात खेलो इंडिया के डिप्टी डायरेक्टर जनरल मयंक श्रीवास्तव ने कही। रायपुर आए श्रीवास्तव ने दैनिक भास्कर से विशेष बातचीत की। कहा कि हमने बस्तर में टैलेंट आइडेंटिफिकेशन ड्राइव में इसे करीब से देखा। वहां से 3 खिलाड़ियों का चयन हुआ। यहां पेश हैं श्रीवास्तव से बातचीत के संपादित अंश… खेलो इंडिया प्रोजेक्ट के ग्राउंड इम्पैक्ट को आप कैसे आंकते हैं?
मयंक: ये सीधे स्पोर्ट्स ईकोसिस्टम को मजबूत करता है। पहले टैलेंट पहचान और ट्रेनिंग में गैप था, अब उसे स्ट्रक्चर किया गया है। हर जिले में खेलो इंडिया सेंटर बन रहे हैं, जहां केंद्र की ओर से सालाना 2 लाख रुपए अनुदान दिया जाता है। मकसद बेसिक इंफ्रास्ट्रक्चर व इक्विपमेंट तय करना है। सेंटर को न्यूनतम 20 एथलीट्स को ट्रेनिंग देने का लक्ष्य है। स्टेट सेंटर ऑफ एक्सीलेंस उच्च स्तरीय ट्रेनिंग का प्लेटफॉर्म बनाते हैं। एलीट एथलीट्स को क्या सपोर्ट?
नेशनल सेंटर ऑफ एक्सीलेंस से टैलेंट को एलीट स्तर पर देखा जाता है। यहां खिलाड़ियों को 10 हजार महीने मिलते हैं। ट्राइबल गेम्स में वित्तीय और संचालन मॉडल क्या रहता है?
आयोजन पूरी तरह स्टैंडर्ड-ड्रिवन होता है। खिलाड़ियों और अधिकारियों के लिए 3-स्टार आवास व्यवस्था अनिवार्य है। फूड इंस्पेक्टर तैनात रहते हैं। कुल मिलाकर केंद्र से करीब 20 करोड़ रुपए का सपोर्ट है, जबकि राज्य सरकार 30 से 35 करोड़ रुपए तक खर्च करती है। यह कोऑर्डिनेटेड एफर्ट ही इवेंट को सफल बनाता है। सवाल: ट्राइबल टैलेंट पूल की संभावनाएं कितनी बड़ी हैं?
जवाब: यह एक अंडर-टैप्ड सेगमेंट है। हमने बस्तर में टैलेंट आइडेंटिफिकेशन ड्राइव के दौरान इसे करीब से देखा। वहां से तीन खिलाड़ियों का सिलेक्शन हुआ। दो अभी स्टेट लेवल पर ट्रेनिंग ले रहे हैं और एक ने नेशनल सेंटर ऑफ एक्सीलेंस में जगह बनाई है। सही सिस्टम और कंटीन्यूअस सपोर्ट मिले, तो यह टैलेंट इंटरनेशनल लेवल तक जा सकता है। छत्तीसगढ़ के आदिवासी क्षेत्र बेल्ट में प्रतिभा और इंफ्रास्ट्रक्चर को कैसे देखते हैं?
आदिवासी अंचल में एथलेटिक एबिलिटी मजबूत है, पर एक्सपोजर और सुविधाओं की कमी है। खेलो इंडिया इस गैप को पाटता है। जब कोई ट्राइबल गेम्स आयोजित करता है, तो नेशनल स्पोर्ट्स फेडरेशन के जुड़ाव से स्थानीय इंफ्रास्ट्रक्चर अपग्रेड होता है। ये लंबे समय तक खिलाड़ियों को लाभ देता है।
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