मानकेश्वरी मंदिर की अनोखी ‘बल पूजा’, जहां बैगा पीते हैं बकरों का खून

छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले के करमागढ़ में स्थित मां मानकेश्वरी देवी मंदिर में शरद पूर्णिमा के पावन अवसर पर 500 साल पुरानी ‘बल पूजा’ की अनूठी परंपरा का निर्वहन किया गया। रायगढ़ राजपरिवार की कुलदेवी माने जाने वाले इस प्राचीन मंदिर में इस वर्ष भी हजारों श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ी। पूजा के दौरान, मनोकामनाएं पूर्ण होने पर भक्तों द्वारा चढ़ाए गए लगभग 50 से 60 बकरों की बलि दी गई, और इस पूरी प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण हिस्सा गांव के बैगा द्वारा इन बकरों का खून पीना रहा, जिसका वीडियो भी सामने आया है।
यह बल पूजा की परंपरा लगभग 500 वर्षों से निरंतर चली आ रही है, जिसकी पुष्टि राज्यसभा सांसद और रायगढ़ राजपरिवार के सदस्य देवेंद्र प्रताप सिंह ने की है। उन्होंने बताया कि यह रियासतकाल से चली आ रही एक गहरी आस्था का प्रतीक है। मानकेश्वरी समिति के पूर्व अध्यक्ष युधिष्ठिर यादव ने भी इस परंपरा के 500 साल पुराने होने की बात दोहराई। मां मानकेश्वरी देवी का यह मंदिर जिला मुख्यालय रायगढ़ से करीब 27 किलोमीटर दूर करमागढ़ में स्थित है और इसे रायगढ़ राजपरिवार की कुलदेवी के रूप में पूजा जाता है।
मंदिर में पहुंचने वाले हजारों श्रद्धालुओं की गहरी आस्था है कि मां मानकेश्वरी देवी उनकी मनोकामनाएं पूर्ण करती हैं। विशेष रूप से संतान प्राप्ति की इच्छा रखने वाले और गंभीर बीमारियों से मुक्ति पाने की कामना करने वाले भक्त यहां मन्नतें मांगते हैं। जब उनकी मन्नतें पूरी हो जाती हैं, तो वे कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए बकरे लेकर मंदिर पहुंचते हैं और बलि की प्राचीन परंपरा का हिस्सा बनते हैं। रायगढ़ के स्थानीय निवासियों के अलावा, ओडिशा और छत्तीसगढ़ के दूर-दराज के गांवों से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु इस वार्षिक पूजा में शामिल होने आते हैं।
इस वर्ष भी शरद पूर्णिमा के दिन दोपहर बाद बल पूजा का विधिवत आरंभ हुआ। मंदिर परिसर में भीड़ को नियंत्रित करने और पूजा की पवित्रता बनाए रखने के लिए मंदिर के सामने बैरिकेडिंग की गई थी। इस व्यवस्था का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि केवल मनोकामना पूरी होने पर बकरा लेकर आए श्रद्धालु और समिति के सदस्य ही पूजा स्थल के भीतर प्रवेश कर सकें। रीति-रिवाजों और मंत्रोच्चार के साथ पूजा-पाठ संपन्न होने के बाद, बलि की परंपरा शुरू हुई, जिसमें इस बार करीब 50 से 60 बकरों की बलि दी गई। समिति के सदस्यों ने यह भी बताया कि कुछ वर्षों में यह संख्या 100 से 120 तक भी पहुंच जाती है।
बल पूजा का सबसे विशिष्ट और रहस्यमयी पहलू गांव के बैगा की भूमिका है। समिति के सदस्यों के अनुसार, यह दृढ़ मान्यता है कि पूजा के दौरान गांव के बैगा के शरीर में स्वयं देवी का वास होता है। इसी अवस्था में बैगा बलि दिए गए बकरों का खून पीते हैं। इस घटना का एक वीडियो भी सामने आया है, जो इस प्राचीन और दुर्लभ परंपरा को दर्शाता है। श्रद्धालु बैगा को देवी का स्वरूप मानकर उनके पैर धोते हैं और उनके सिर पर दूध डालकर श्रद्धापूर्वक पूजा करते हैं। समिति के सदस्यों ने यह भी बताया कि खून पीने के बाद भी बैगा के शरीर पर किसी प्रकार का कोई दुष्प्रभाव या नकारात्मक प्रभाव दिखाई नहीं देता है, जिसे देवी की शक्ति का प्रमाण माना जाता है।
बल पूजा से एक रात पहले, पूरे विधि-विधान और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ ‘निशा पूजा’ का आयोजन किया जाता है। इस विशेष पूजा के दौरान, रायगढ़ राजपरिवार की ओर से गांव के बैगा के अंगूठे में एक नवरत्न की अंगूठी पहनाई जाती है। समिति के पूर्व अध्यक्ष युधिष्ठिर यादव ने इस अंगूठी के बारे में एक दिलचस्प तथ्य साझा किया। उन्होंने बताया कि सामान्य दिनों में यह अंगूठी बैगा के अंगूठे में ढीली रहती है, लेकिन बल पूजा के दिन, जब देवी का वास माना जाता है, तो यह अंगूठी बैगा के अंगूठे में कस जाती है, जिसे एक दैवीय संकेत के रूप में देखा जाता है।
बल पूजा के दौरान करमागढ़ और उसके आसपास के क्षेत्रों में रातभर एक मेले जैसा उत्साहपूर्ण माहौल बना रहता है। हजारों की संख्या में श्रद्धालु इस प्राचीन परंपरा के साक्षी बनने और मां मानकेश्वरी देवी का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए एकत्रित होते हैं। यह आयोजन न केवल एक धार्मिक अनुष्ठान है, बल्कि यह क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत और लोगों की अटूट आस्था का भी प्रतीक है, जो सदियों से पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही है।
राज्यसभा सांसद और रायगढ़ राजपरिवार के सदस्य देवेंद्र प्रताप सिंह ने एक बार फिर इस बात पर जोर दिया कि मां मानकेश्वरी देवी की पूजा की यह परंपरा रियासतकाल से ही चली आ रही है। उन्होंने कहा कि गांव के लोगों की मां के प्रति गहरी आस्था है और आज भी वे पुराने रीति-रिवाजों और परंपराओं का पूरी निष्ठा के साथ पालन कर रहे हैं, जो इस क्षेत्र की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान का अभिन्न अंग है।



