छत्तीसगढ़राज्यरायगढ़

हमारे धम ग्रंथ एवं हिन्दु विधि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता एवं भारतीय न्याय संहिता एवं छुआछुत अधिनियम

Our religious texts and Hindu law, Indian Civil Defence Code and Indian Judicial Code and Untouchability Act

15 अगस्त विज्ञापन

घरघोडा- भारत ऋषियों एवं संतों का देष है, इसलिये भारत महान है, भारत जहां नारी की पूजा होती है, इसलिये भारत महान है, भारत में नारी को देवी का दर्जा दिया गया है, इसलिये नारी चाहे जिस रूप में हो, उसके नाम के पहले अत्यंत सम्मान सूचक शब्द का प्रयोग किया जाता है, यह सम्मान सूचक शब्द विष्व के अन्य किसी भी देष में देखने को नहीं मिलेगा, आप देखेंगे, यदि नारी बालिका है, अविवाहित है, तो उसे कुमारी शब्द के संबोधन से उसके नाम के पहले जोड़कर संबोधित किया जाता है।

यह कुमारी शब्द मां दुर्गा के नाम का प्रतीक है, मां दुर्गा के भक्त मांग दुर्गा को कुमारी नाम से भी पूजते हैं, यदि नारी बाल्यावस्था पार कर अविवाहित है तो उसके नाम के आगे सुश्री जोड़कर पुकारा जाता है, यह भी शब्द मां लक्ष्मी के नाम का पर्यायवाची है। विवाहिता नारी को गृह लक्ष्मी के रूप में हमारा भारतीय हिन्दु समाज स्वीकार करता है, नारी घर की लक्ष्मी ही तो होती है, चाहे वह जिस रूप में हो, मां हो, बहन हो, पत्नी हो या बेटी पूजनीय है, इसलिये कहा गया है कि ‘‘यत्र नार्म स्तु पूज्यन्ते, रमन्ते यत्र देवता’’ इसका तात्पर्य नारी को धूप, दीप, आरती से पूजने का नहीं है, अपितु नारी के सम्मान एवं उसके सत्कार से है।

प्राचीन समय में नारी को समाज में परिवार में श्रेष्ठ (प्रतिष्ठित) स्थान प्राप्त था, हमारे धर्मग्रंथ इसका प्रमाण है, नारी को परिवार की व्यवस्थापिका और नियंत्रण करने वाली माना गया है, विष्णु पुराण का वचन है, पत्नी मूलं गृहं पुसां अर्थात् गृहस्थ आश्रत की सफलता का मूल नारी ही है। भारत के मनिषीगण ने अनेक ग्रंथों में प्राचीन समय से नारी के समाज में श्रेष्ठ स्थान के बारे में उल्लेख किया है।

किन्तु मध्यकाल में नारी विदेषी आक्रमण के कारण कुरूतियों का षिकार होते चली गई एवं समाज में उसका स्थान गिरता गया, परिवार में उसे पति की दासी होने का दर्जा दिया गया, उसे अनेक बंधनों में बांधा जाकर तिरस्कृत किया जाता रहा। सदैव से यह होता चला आ रहा है कि, समाज देष राष्ट्र अनुचित राह पर चलने लगता है तो उसे दिषा देने के लिये उचित राह दिखाने के लिये संत, ऋषियों एवं महात्माओं का योगदान होता है, ये संत महापुरूष मानव जाति के कल्याण के लिये तथा राष्ट्र की सुरक्षा के लिये अपने राष्ट्र निर्माण की रचना कर हमें जीवन जीने की राह बताते हैं, उन्हीं सदुग्रंथों में उड़िसा के एक मकान कवि श्री बलराम दास हैं, जिन्होनें भगवान श्री कृष्ण, मां लक्ष्मी एवं श्री बलभद्र स्वामी को माध्यम बनाकर महालक्ष्मी महात्म की रचना करते हुये परिवार में नारी के वर्चस्व को प्रतिपादित किया है तथा समाज में व्याप्त लगभग 500 वर्ष पूर्व व्याप्त जाति-पाति, ऊंच-नीच के दूषित भावना को दूर करने का प्रयास किया है एवं मानव जाति के कल्याण के लिये मार्ग प्रस्तुत किया था।

संभवतः भारतीय कानून व्यवस्था भी इन्हीं सदग्रंथों की देन है, अगहन मास को सभी महीनों में पुनीत माना गया है, अगहन मास में जितने भी गुरूवार पड़ते हैं, उनमें महालक्ष्मी के व्रत एवं पूजा का विधान बताते हुये कवि ने ऊंच-नीच, जाति-पाति की गहरी खाई को पाटने का प्रयास करते हुये नारी को तिरस्कृत करने पर होने वाले दुष्परिणामों को उजागर किया है, लक्ष्मी माता को तिरस्कृत करने के कारण स्वयं दरिद्र होकर भटकना पड़ा, मां महालक्ष्मी जब प्रातः नगर भ्रमण के लिये निकलती है, किसी के घर में स्वच्छता न देखकर दुखी हो जाती है, भ्रमण करते हुये ग्राम के बाहर जब वह श्रयिा नाम की छोटी जाति की महिला के द्वार में पहुंचती है तो वहां की स्वच्छता एवं सुंदरता कोदेखकर मुग्ध हो जाती हैं, तथा उसके घर में प्रविष्ट होती है।

वहां श्रीया को विविध पुष्पों से, धूपदीप से मां लक्ष्मी के पूजन में संलग्न देखकर महालक्ष्मी अत्यंत प्रसन्न होकर उसका पूजा ग्रहण करती हुई अनेक वरदान उसे प्रदान करती है, यहां पर कवि ने समाज में व्याप्त जातिभेद, छुआछूत, अमीर-गरीब के भेदभाव को मिटाने का अनुकरणीय प्रयास किया है, माता जब उस अछूत श्रीया के घर से निकलकर अपने महल में लौटती है, जो भगवान जगन्नाथ अपने बड़े भाई के आदेषों कापालन करते हुये उन्हें द्वार पर ही रोक लेते हैं तथा अछूत के घर जाने के कारण उन्हें घर से बहिस्कृत कर देते हैं, तब महालक्ष्मी उन्हें अनेक प्रकार से समझाती हैं और याद दिलाती है कि, जब सागर मंथन हुआ, मेरा अवतरण हुआ, विवाह के समय मेरे पिता द्वारा जब मुझे आपकोअर्पण किया गया, तब आपने स्वीकार करते हुये प्रत्येक अघ्घन मांस के गुरूवार के दिन मेरा वार होगा, उस दिन मैं घुमने के लिये स्वतंत्र रहूंगी।

उसे आपने स्वीकार कर छुआछुत, अमीर-गरीब का ध्यान न देने संबंधी कथन किया था तथा मेरे पिता को मेरे द्वारा गलती करने पर क्षमा करने का कथन आपने किया था, किन्तु भगवान उन्हें अंदर जाने की स्वीकृति नहीं देते, तब मां दुखी व क्षुब्ध होकर अपने शरीर के समस्त अलंकार निकालकर भगवान को समर्पित करती, तब भगवान उन अलंकारों को लक्ष्मी से लेने के लिये इंकार करते हैं और कहते हैं, उन अलंकारों से हमारा कोई प्रयोजन नहीं है, यह सिर्फ तुम्हारा है, तुम इन्हें लेकर जाओ, इन्हें बेचकर भोजन, कपड़ा की व्यवस्था करो, भारतीय कानून व्यवस्था हिन्दु विधि इसका अनुषरण करती है, कानून में भी यह व्यवस्था की गई है कि, नारी के आभूषण उसके स्त्रीधन हैं, जिस परकेवल उसका ही अधिकार होता है।

इस पर पति, माता-पिता, बंधु-बांधवों का कोई अधिकार नहीं रहता है, जगन्नाथ स्वामी, महालक्ष्मी को जाते हुये यह भी कहते हैं कि, तुम्हारे भरण पोषण के लिये प्रतिदिन 1/2 किलो के हिसाब से चावल देते रहेंगे, तुम अपना खर्च चलाते रहना,नारी प्रताड़ना नारी के विरूद्ध किये गये प्रतिकूल टिप्पणी आज भी नीन्दनीय है, वर्तमान में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, भारतीय न्याय संहिता, छुआछुत अधिनियम एवं हिन्दु विधि आदि में नारी के संबंध में विस्तृत रूप से नारी को महान माना गया है। संभवतः इसलिये आज भी महिला स्व-षक्तिकरण के प्रति सस्कार एवं लोगों की लोकप्रियता बढ रही है।

15 अगस्त विज्ञापन
विज्ञापन 1
विज्ञापन 2
विज्ञापन 3
विज्ञापन 4
विज्ञापन 5
विज्ञापन 6
विज्ञापन 7
विज्ञापन 8

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!