Uncategorized

छत्तीसगढ़ की बेटी ने कॉमनवेल्थ में जीता सिल्वर मेडल, ज्ञानेश्वरी यादव ने 199 किलो वजन उठाकर रचा इतिहास

15 अगस्त विज्ञापन


नईदुनिया प्रतिनिधि, राजनांदगांव। राजनांदगांव की बेटी ज्ञानेश्वरी यादव ने राष्ट्रमंडल खेल-2026 के मंच पर अपने संघर्ष को एक और बड़ी उपलब्धि में बदल दिया। स्काटलैंड के ग्लास्गो में सोमवार को आयोजित 53 किग्रा महिला वेटलिफ्टिंग स्पर्धा में ज्ञानेश्वरी ने कुल 199 किलोग्राम (स्नैच 88 किग्रा और क्लीन एंड जर्क 111 किग्रा) वजन उठाकर रजत पदक अपने नाम किया।

स्वर्ण पदक नाइजीरिया की ओनोमे ओमोलोला डिडिह ने 206 किलोग्राम के साथ जीता, जबकि कनाडा की रेबेका ग्रूलक्स 178 किलोग्राम के साथ कांस्य पदक पर रहीं।

199 किलो वजन उठाकर रचा इतिहास

ज्ञानेश्‍वरी की यह जीत उस मुश्किल समय में आई है जब उनका भाई रितेश यादव दुर्घटना में घायल होकर अस्‍पताल में भर्ती है। माता-पिता उसकी देखरेख में जुटे हैं। दीपक यादव ने बताया कि ज्ञानेश्‍वरी ने बात कर उसका हालचाल लिया था और उससे पदक जीतने का वायदा किया था। उसने अपना वायदा पूरा कर दिया है।

बारबेल पर उठे 199 किलोग्राम के पीछे वर्षों का संघर्ष, पिता का पसीना और पूरे परिवार का त्याग छिपा है। राजनांदगांव की अंतरराष्ट्रीय वेटलिफ्टर ज्ञानेश्वरी ने वर्ष 2022 से लगातार अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पदक जीतकर अपनी अलग पहचान बनाई है। अब राष्ट्रमंडल खेलों का रजत पदक उनके करियर की एक और बड़ी उपलब्धि बन गया है।

naidunia_image

जिम से शुरू हुई खेल यात्रा और परिवार की आर्थिक चुनौती

ज्ञानेश्वरी की खेल यात्रा किसी बड़े स्टेडियम से नहीं, बल्कि पिता दीपक यादव के साथ राजनांदगांव की जय भवानी व्यायामशाला से शुरू हुई। दीपक स्वयं बॉडी बिल्डिंग करते थे। सातवीं कक्षा में पढ़ने वाली ज्ञानेश्वरी भी उनके साथ व्यायाम करने लगी। बेटी की लगन देखकर उन्होंने कोच अजय लोहार से उसे वेटलिफ्टिंग सिखाने का आग्रह किया। उस दिन हाथ में उठाया गया बारबेल आज भी उनके हाथों से नहीं छूटा है।

परिवार के सामने सबसे बड़ी चुनौती आर्थिक थी। दीपक इलेक्ट्रिशियन का काम कर महीने में तीन से पांच हजार रुपये कमाते थे। इसी आय से घर, दो बच्चों की पढ़ाई और ज्ञानेश्वरी की महंगी डाइट, जूते, किट तथा प्रतियोगिताओं का खर्च चलता था। कई बार परिवार ने अपनी जरूरतें टाल दीं, लेकिन बेटी के प्रशिक्षण में कोई कमी नहीं आने दी।

naidunia_image

संघर्ष से हासिल की बड़ी सफलता

ग्राम भोड़िया से रोज सुबह आठ किलोमीटर साइकिल चलाकर दीपक बच्चों को लेकर राजनांदगांव आते। बच्चे स्कूल जाते, फिर व्यायामशाला में घंटों अभ्यास करते। रात करीब 11 बजे पूरा परिवार एक ही साइकिल से गांव लौटता। घर पर मां दुर्गा यादव सीमित संसाधनों में पूरे परिवार की जिम्मेदारी निभाते हुए हर दिन इस चिंता में रहती थीं कि अगले दिन की तैयारी कैसे होगी।

दीपक बताते हैं कि उन्होंने कई बार 20-20 घंटे तक काम किया, लेकिन बेटी की डाइट और तैयारी से कभी समझौता नहीं किया। पासपोर्ट बनवाने से लेकर विदेश प्रतियोगिताओं तक भेजने की हर तैयारी उन्होंने समय रहते पूरी की। उन्हें भरोसा था कि संघर्ष ही बेटी की सबसे बड़ी ताकत बनेगा।

पटियाला में प्रशिक्षण से लेकर पुलिस में नियुक्ति

आज ज्ञानेश्वरी पटियाला स्थित नेताजी सुभाष राष्ट्रीय खेल संस्थान में प्रशिक्षण ले रही हैं। वर्ष 2022 में ग्रीस में आयोजित जूनियर विश्व वेटलिफ्टिंग चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीतने के बाद उन्होंने लगातार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का नाम रोशन किया। वर्ष 2023 में छत्तीसगढ़ सरकार ने उन्हें सहायक उप निरीक्षक के पद पर नियुक्त किया।

naidunia_image

इसके बावजूद परिवार का संघर्ष पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ। राजनांदगांव में लिया गया मकान अब भी ऋण पर है और उसकी किस्त पूरा परिवार मिलकर चुका रहा है। ऐसे में राष्ट्रमंडल खेलों का यह रजत पदक केवल ज्ञानेश्वरी की सफलता नहीं, बल्कि पूरे परिवार के वर्षों के त्याग और विश्वास का सम्मान है।

रजत तक का सफर

  • राष्ट्रमंडल खेल-2026, ग्लास्गो में 53 किग्रा वर्ग में जीता रजत पदक।
  • स्नैच में 88 किग्रा और क्लीन एंड जर्क में 111 किग्रा उठाया।
  • कुल 199 किलोग्राम वजन उठाकर दूसरा स्थान हासिल किया।
  • नाइजीरिया की ओनोमे ओमोलोला डिडिह (206 किग्रा) को स्वर्ण और कनाडा की रेबेका ग्रूलक्स (178 किग्रा) को कांस्य पदक मिला।

पहला पदक बना था टर्निंग प्वाइंट

वर्ष 2017 में दुर्ग में आयोजित राज्य स्तरीय प्रतियोगिता में ज्ञानेश्वरी ने पहला कांस्य पदक जीता था। इसी उपलब्धि ने परिवार का विश्वास मजबूत किया कि बेटी अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंच सकती है। इसके बाद वर्ष 2022 में कामनवेल्थ वेटलिफ्टिंग चैंपियनशिप में जूनियर और सीनियर दोनों वर्गों में स्वर्ण पदक जीतकर उन्होंने दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा। अब राष्ट्रमंडल खेलों का रजत पदक उनकी उपलब्धियों में एक और स्वर्णिम अध्याय जोड़ गया।

यह भी पढ़ें- छत्तीसगढ़ के समीर की उड़ान नहीं रोक सकी आर्थिक तंगी, अब गांव का पहला MBBS डॉक्टर बनेगा बेटा

जन्मदिन नहीं, अभ्यास था सबसे बड़ा उत्सव

ज्ञानेश्वरी के पिता बताते हैं कि परिवार कई बार उनका जन्मदिन भी नहीं मना सका। दोस्तों के साथ घूमना, पारिवारिक कार्यक्रमों में शामिल होना और सामान्य जीवन की कई खुशियां उन्होंने खुद छोड़ दीं। वर्षों तक उनकी दुनिया केवल स्कूल, व्यायामशाला और बारबेल के बीच सिमटी रही। आज उसी तपस्या का परिणाम है कि राजनांदगांव की यह बेटी राष्ट्रमंडल खेलों में भारत के लिए रजत पदक जीतकर लौटी है।



Source link

15 अगस्त विज्ञापन
विज्ञापन 1
विज्ञापन 2
विज्ञापन 3
विज्ञापन 4
विज्ञापन 5
विज्ञापन 6
विज्ञापन 7
विज्ञापन 8

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!