छत्तीसगढ़

छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा की सोशल वर्कर डॉ. बुधरी ताती को राष्ट्रपति ने पद्मश्री सम्मान से नवाजा

15 अगस्त विज्ञापन

छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा की सोशल वर्कर डॉ. बुधरी ताती को राष्ट्रपति ने पद्मश्री सम्मान से नवाजा है। उन्होंने बस्तर के बीहड़ों में 35 साल तक पैदल सफर तय कर 545 से ज्यादा गांवों तक मदद पहुंचाई है।

बुधरी ताती ने महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के साथ-साथ शिक्षा, स्वास्थ्य और पर्यावरण के लिए काम किया। जानलेवा हमलों, विरोध और मुश्किल हालातों के बाद भी उन्होंने कदम पीछे नहीं खींचे और अपनी पूरी जिंदगी समाज सेवा में लगा दी।

राष्ट्रपति भवन में सम्मान लेते समय डॉ. बुधरी ताती बस्तर की पारंपरिक आदिवासी वेशभूषा में नजर आईं, जिसने सबका ध्यान खींचा। मॉडर्न कपड़ों के बजाय इस पहनावे को चुनकर उन्होंने अपनी संस्कृति और जड़ों से जुड़े रहने का संदेश दिया। यह पद्मश्री उनके जीवन का 23वां सम्मान है। बस्तर के गांवों में लोग उन्हें प्यार से ‘बुआ’ और ‘बड़ी दीदी’ कहते हैं।

15 साल की उम्र में तय कर लिया था, जीवन समाज के नाम होगा

1984-85 में गुरमगुंडा आश्रम के लखमू बाबा से प्रेरित होकर बुधरी ताती ने समाज सेवा का रास्ता चुना। उस समय उनकी उम्र करीब 15 साल थी। उन्होंने परिवार को समझाया और नागपुर स्थित अखिल भारतीय राष्ट्रीय सेवा समिति में जाकर 3 से 4 महीने का प्रशिक्षण लिया। वहां से रायपुर और फिर बस्तर लौटकर उन्होंने समाज सेवा की शुरुआत की।

यह वह दौर था, जब आदिवासी इलाकों में महिलाओं का घर से बाहर निकलना भी आसान नहीं था। ऐसे समय में उन्होंने अशिक्षा, अंधविश्वास और सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ काम शुरू किया।

545 गांवों तक पैदल पहुंचीं, 500 से ज्यादा महिलाओं को बनाया आत्मनिर्भर

डॉ. बुधरी ताती ने अपने जीवन के 35 साल बस्तर के अंदरूनी इलाकों को समर्पित कर दिए। वे अब तक 545 से अधिक गांवों तक पैदल पहुंच चुकी हैं। उन्होंने 500 से ज्यादा महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाया।

किसी को सिलाई-कढ़ाई से जोड़ा तो किसी को स्वरोजगार के अन्य साधनों से। उनका मानना है कि जब तक महिलाएं आर्थिक रूप से मजबूत नहीं होंगी, तब तक समाज भी मजबूत नहीं हो सकता।

शिक्षा, स्वास्थ्य और पर्यावरण संरक्षण को बनाया मिशन

महिला सशक्तिकरण के साथ-साथ उन्होंने शिक्षा, स्वास्थ्य और पर्यावरण संरक्षण पर भी विशेष काम किया। अंदरूनी गांवों में जाकर महिलाओं को स्वच्छता, पोषण, मातृ-शिशु स्वास्थ्य और बीमारियों से बचाव की जानकारी दी। उन्होंने नशाखोरी के खिलाफ भी अभियान चलाया, जिसका असर कई गांवों में देखने को मिला और कई लोगों ने नशा छोड़कर नई शुरुआत की।

समाज सेवा के लिए नहीं की शादी

बुधरी ताती ने समाज सेवा को ही अपना परिवार मान लिया। उन्होंने शादी नहीं करने का फैसला लिया और पूरी जिंदगी समाज के नाम कर दी। आज बस्तर के कई गांवों में लोग उन्हें ‘बुआ’ और ‘बड़ी दीदी’ कहकर बुलाते हैं। उनके लिए हर बच्चा अपना है, हर महिला परिवार का हिस्सा है और हर बुजुर्ग सम्मान का पात्र है।

जानलेवा हमले भी नहीं तोड़ पाए हौसला

बुधरी ताती ने बताया कि एक बार अबूझमाड़ के एक गांव में काम के दौरान ग्रामीणों ने धारदार हथियारों के साथ उन्हें दौड़ाया था। हालात इतने गंभीर हो गए थे कि उनकी जान पर बन आई थी, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। उनका कहना है कि अगर वह उस दिन डर जातीं, तो आज भी वहां की कई महिलाएं अंधेरे में जिंदगी जी रही होतीं।

वृद्धाश्रम और अनाथ बच्चों की जिम्मेदारी भी संभाल रहीं

हिरानार में उन्होंने एक वृद्धाश्रम की स्थापना की है, जहां बेसहारा बुजुर्गों को सहारा और सम्मान मिल रहा है। इसके साथ ही वे गरीब और अनाथ आदिवासी बच्चों की शिक्षा, रहन-सहन और भविष्य की जिम्मेदारी भी उठा रही हैं। इस काम में उनकी भतीजी अन्ति वेक भी उनका साथ दे रही हैं।

अब तक मिल चुके हैं 23 सम्मान

डॉ. बुधरी ताती ने बताया कि पद्मश्री से पहले उन्हें 22 पुरस्कार मिल चुके हैं, जिनमें 3 राष्ट्रीय स्तर के सम्मान शामिल हैं। पद्मश्री उनके जीवन का 23वां सम्मान है।

पद्मश्री सम्मान क्या होता है?

पद्मश्री भारत सरकार का चौथा सर्वोच्च नागरिक सम्मान है। इसकी शुरुआत 1954 में हुई थी। यह सम्मान कला, साहित्य, शिक्षा, समाज सेवा, विज्ञान, चिकित्सा, खेल, लोक प्रशासन और अन्य क्षेत्रों में असाधारण योगदान देने वाले लोगों को दिया जाता है।

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