जशपुर

चक्रधर समारोह की छठवीं सांस्कृतिक संध्या: सांसद विजय बघेल ने दीप प्रज्वलित कर किया शुभारंभ, ओडिसी प्रस्तुतियों ने मोहा मन

15 अगस्त विज्ञापन

41वें अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त चक्रधर समारोह की छठवीं सांस्कृतिक संध्या का शुभारंभ दुर्ग लोकसभा सांसद विजय बघेल ने दीप प्रज्वलित कर किया। समारोह में पहुंचने से पहले उन्होंने रामलीला मैदान परिसर में भगवान गणेश की पूजा-अर्चना की और प्रदेशवासियों की सुख-समृद्धि और खुशहाली की कामना की। इसके बाद महाराजा चक्रधर सिंह के छायाचित्र पर पुष्प अर्पित कर उन्हें नमन किया। सांसद ने समारोह में शामिल कलाकारों और प्रतिभागियों को स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया।

सांसद विजय बघेल ने कहा कि चक्रधर समारोह में शामिल होना उनके लिए पहला अवसर है। उन्होंने कहा कि महाराजा चक्रधर सिंह ने संगीत, संस्कृति, परंपरा और कलाकारों को एक मंच पर लाने का महत्वपूर्ण काम किया। उनके प्रयासों से कला और संस्कृति को नई पहचान मिली और कलाकारों को अपनी प्रतिभा दिखाने का मंच मिला। उन्होंने कहा कि कला और संस्कृति देश को जोड़ती है।

चक्रधर समारोह चार दशक से अधिक समय से कला और संस्कृति की परंपरा को आगे बढ़ा रहा है। देश के अलग-अलग राज्यों से आने वाले कलाकार लोक और शास्त्रीय कलाओं के जरिए भारत की विविध सांस्कृतिक विरासत को एक मंच पर प्रस्तुत करते हैं। अलग-अलग भाषा, बोली, खान-पान और परंपराओं के बावजूद कला और संस्कृति लोगों को एक सूत्र में जोड़ती है।

सुप्रसिद्ध ओडिसी नृत्यांगना एवं गुरु रीला होता और समूह ने ‘एकोऽहम् बहुस्याम्’ की प्रस्तुति दी। नृत्य, संगीत और भाव-अभिव्यक्ति के समन्वय से सजी इस प्रस्तुति में वैदिक ज्ञान, भारतीय जीवन-दर्शन और आध्यात्मिक चेतना को मंच पर प्रस्तुत किया गया। प्रस्तुति की शुरुआत मंगलाचरण से हुई। इसमें अग्नि, जल और परमात्मा को समर्पित स्तुति के जरिए सृष्टि के मूल तत्वों और दिव्य चेतना का भाव दिखाया गया।

इसके बाद गृहस्थ आश्रम के माध्यम से पारिवारिक जीवन, नारी सम्मान और सामाजिक सामंजस्य को नृत्य के जरिए प्रस्तुत किया गया। प्रस्तुति के अंतिम चरण में संन्यास और मोक्ष के जरिए जीवात्मा और परमात्मा के एकाकार होने की आध्यात्मिक यात्रा को दिखाया गया। ‘एकोऽहम् बहुस्याम्’ का अर्थ है- ‘मैं एक हूं और अनेक रूपों में व्यक्त हूं।’ इस वैदिक भाव ने प्रस्तुति को विशेष आध्यात्मिक गहराई दी।

ओडिसी कलाकार गौरीशंकर दाश ने भी भावपूर्ण प्रस्तुति दी। लय, ताल, मुद्राओं और भावों के समन्वय से सजी उनकी प्रस्तुति में ओडिसी नृत्य की शास्त्रीय गरिमा और सौंदर्य देखने को मिला। गौरीशंकर दाश ने अपनी कलात्मक यात्रा ओडिसी संगीत से शुरू की। उन्होंने पद्मभूषण गुरु केलुचरण महापात्र के सान्निध्य में ओडिसी नृत्य की शिक्षा ली। उन्होंने ओडिसी संगीत, ओडिसी नृत्य और ओड़िया साहित्य में स्नातकोत्तर उपाधि हासिल की है।

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