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भिलाई में ‘मूल सोमनाथ’ अवशेषों के दर्शन, उमड़ा जनसैलाब: हजारों श्रद्धालुओं ने की पूजा, 1000 साल पुराना इतिहास – durg-bhilai News

15 अगस्त विज्ञापन




भिलाई के सेक्टर-10 स्थित गुंडिचा मंडप में प्राचीन सोमनाथ ज्योतिर्लिंग के अवशेषों के दर्शन के लिए हजारों श्रद्धालु उमड़े। इस विशेष कार्यक्रम में दर्शन, सत्संग और आध्यात्मिक संवाद का आयोजन किया गया, जिसमें भक्तों में गहरी आस्था और उत्सुकता देखी गई। यह कार्यक्रम आर्ट ऑफ लिविंग छत्तीसगढ़ द्वारा 20 से 30 अप्रैल तक विभिन्न जिलों में आयोजित राज्यव्यापी दर्शन यात्रा का हिस्सा है। इस यात्रा का उद्देश्य श्रद्धालुओं को इन प्राचीन अवशेषों के दर्शन कराना है। कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण वे अवशेष थे, जिन्हें आर्ट ऑफ लिविंग और आध्यात्मिक गुरु श्री श्री रविशंकर से जुड़े सूत्र ‘प्राचीन मूल सोमनाथ ज्योतिर्लिंग’ का हिस्सा मानते हैं। दावा किया जाता है कि 11वीं शताब्दी में महमूद गजनवी द्वारा सोमनाथ मंदिर पर हुए हमले के बाद इसके खंडों को दक्षिण भारत के अग्निहोत्री परिवारों ने संरक्षित रखा था। बेंगलुरु के स्वामी प्रणवानंद के अनुसार, 1924 में कांची के शंकराचार्य श्री जयेंद्र सरस्वती ने भविष्यवाणी की थी कि इस शिवलिंग को 100 साल तक बाहर न लाया जाए। उन्होंने कहा था कि 100 साल बाद कर्नाटक में एक विशेष संत होंगे, जिनके नाम में शंकर जी का नाम जुड़ा होगा, उन्हें यह सौंपना, जो इसे सही रूप में स्थापित करेगा। जनवरी 2025 में, अग्निहोत्री परिवार ने श्री श्री रविशंकर से संपर्क किया। उन्होंने शंकराचार्य की भविष्यवाणी के अनुसार, 100 साल पूरे होने पर इन अवशेषों को गुरुदेव को सौंपा। सौंपे जाने की यह परंपरागत कथा इस आयोजन में श्रद्धालुओं के बीच विशेष आकर्षण का केंद्र रही। सोमनाथ ज्योतिर्लिंग को 12 ज्योतिर्लिंगों में पहला और विशेष शक्तिशाली माना जाता है। ऐतिहासिक उल्लेखों के अनुसार, सोमनाथ ज्योतिर्लिंग के हवा में स्थित होने की मान्यता सदियों से चर्चा का विषय रही है। 11वीं शताब्दी के विद्वान अल-बरुनी के यात्रा वृत्तांत में इसका उल्लेख मिलता है कि गर्भगृह में शिवलिंग बिना किसी दृश्य सहारे के सतह से ऊपर प्रतीत होता था। वैज्ञानिक तर्क और चुंबकीय सिद्धांत इतिहासकारों और शोधकर्ताओं के अनुसार यह संभवतः चुंबकीय शक्ति (Magnetic Levitation) का अद्भुत उदाहरण रहा होगा। मान्यता है कि मंदिर की दीवारों, छत और फर्श में शक्तिशाली चुंबकीय पत्थर इस तरह स्थापित थे कि उनके संतुलन से शिवलिंग हवा में स्थिर रहता था। इसे प्राचीन भारतीय इंजीनियरिंग की अनोखी उपलब्धि भी माना जाता है। पौराणिक और आध्यात्मिक पक्ष पुराणों में सोमनाथ ज्योतिर्लिंग को स्वयंभू और चंद्रदेव द्वारा स्थापित बताया गया है। हवा में स्थित होने की मान्यता इसके दिव्य और अलौकिक स्वरूप को भी दर्शाती है, जिससे इसकी आध्यात्मिक महत्ता और बढ़ जाती है। साइंटिफिक ऑब्जर्वेशन और रहस्य कुछ दावों के अनुसार शिवलिंग में असामान्य मैग्नेटिक गुण पाए गए, जबकि कम आयरन होने के बावजूद उसका चुंबकीय व्यवहार वैज्ञानिकों के लिए रहस्य बना रहा। कथित रासायनिक संरचना—बेरियम, सिलिकॉन, मैग्नीशियम, सल्फर और अल्प आयरन—को लेकर भी कई दावे किए गए हैं। कुछ जियोलॉजिकल दावों में इसे सामान्य चट्टानों और उल्कापिंडों से अलग बताया गया है। स्वामी प्रणवानंद ने बताई पुनर्स्थापना की कथा बेंगलुरु आश्रम से आए स्वामी प्रणवानंद ने कहा कि श्री श्री रविशंकर के मार्गदर्शन में इन अवशेषों की पुनर्स्थापना और देशभर में दर्शन यात्रा संचालित की जा रही है। उन्होंने बताया कि महमूद गजनवी के आक्रमण के बाद संरक्षित इन अवशेषों को अब पुनः जनमानस से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि मार्च 2025 में दिल्ली में पहली बार इन अवशेषों का सार्वजनिक अनावरण किया गया था और अब देशभर में रुद्राभिषेक, सत्संग और जनदर्शन के माध्यम से इन्हें लोगों तक पहुंचाया जा रहा है। सांसद विजय बघेल के अनुसार यह केवल आस्था का विषय नहीं, बल्कि भारतीय ज्ञान परंपरा और प्राचीन विज्ञान के आयामों को समझने का भी अवसर है। कुंभ से भिलाई तक बना चर्चा का केंद्र आयोजकों ने बताया कि प्रयागराज कुंभ फरवरी 2025 में भी इस दुर्लभ शिवलिंग के दर्शन कराए गए थे, जहां कई धर्माचार्यों और संतों ने इसकी महत्ता पर चर्चा की थी।



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