
गौरीशंकर गुप्ता /बीजापुर: जिले के एर्रापल्ली गांव में नक्सलियों द्वारा एक सरेंडर नक्सली की निर्मम हत्या ने पूरे क्षेत्र को दहशत में डाल दिया है। यह घटना छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित इलाकों में बढ़ते हिंसक कृत्यों की एक और कड़ी है, जहां आत्मसमर्पित नक्सली भी सुरक्षित नहीं रह पाते।
26 दिसंबर 2025 की रात करीब 10 बजे पामेड़ थाना क्षेत्र के एर्रापल्ली गांव में नकाबपोश नक्सली एक सरेंडर माओवादी के घर में घुसे। मृतक की पहचान पुनेम बुदरा (उम्र 22-28 वर्ष, पिता जोगा) के रूप में हुई है, जो 2022 में सुकमा जिले में आत्मसमर्पण कर चुका था। नक्सलियों ने उसे घर से बाहर बुलाया और कुल्हाड़ी या धारदार हथियार से कई प्रहार कर मौके पर ही मौत के घाट उतार दिया, फिर फरार हो गए। सुबह ग्रामीणों को शव मिला, जिससे गांव में हड़कंप मच गया और परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल हो गया।
नक्सलियों ने हत्या से पहले पुनेम पर पुलिस मुखबिरी का आरोप लगाया था। आत्मसमर्पण के बाद वह मई-जून 2025 से अपने पैतृक गांव एर्रापल्ली में सामान्य जीवन जी रहा था, लेकिन नक्सली संगठन उसे लगातार संदेह की नजर से देख रहा था। यह घटना नक्सलियों की कायराना रणनीति को दर्शाती है, जहां वे पूर्व साथियों को भी निशाना बनाते हैं ताकि अन्य सरेंडर करने वालों में भय पैदा हो। क्षेत्रीय सूत्रों के अनुसार, नक्सली स्मॉल एक्शन टीम (SAG) ने यह हमला किया।
घटना की सूचना मिलते ही पामेड़ थाना पुलिस और सुरक्षा बल रवाना हुए, लेकिन दुर्गम इलाके के कारण पहुंच में देरी हुई। पुलिस ने हत्या का मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है और इलाके में सर्च ऑपरेशन चलाया जा रहा है। अब तक कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं हुआ, लेकिन सुरक्षा बलों ने गांव वालों से सहयोग की अपील की है। यह 20 दिनों में बीजापुर की दूसरी ऐसी घटना है; पहले एक उत्तर प्रदेश के सड़क ठेकेदार की बेरहमी से हत्या हुई थी।
बीजापुर छत्तीसगढ़ का सबसे अधिक नक्सल प्रभावित जिला है, जहां पामेड़, एर्रापल्ली जैसे गांव घने जंगलों और पहाड़ियों से घिरे हैं। नक्सली यहां मुखबिरी के शक में ग्रामीणों, ठेकेदारों और सरेंडर नक्सलियों को निशाना बनाते रहते हैं। सरेंडर नीति के बावजूद, ऐसे हमले आत्मसमर्पित नक्सलियों की सुरक्षा पर सवाल खड़े करते हैं। स्थानीय लोग भय के साये में जी रहे हैं और विकास कार्य रुक गए हैं।
इस हत्या से एर्रापल्ली और आसपास के गांवों में दहशत व्याप्त है। ग्रामीण रात में घरों से बाहर निकलने से डर रहे हैं और सुरक्षा की मांग कर रहे हैं। पूर्व घटनाओं में भी नक्सलियों ने निर्दोषों को शिकार बनाया, जिससे सामान्य जीवन ठप हो जाता है। यह घटना नक्सलवाद के खात्मे की चुनौतियों को उजागर करती है, जहां शांति की कोशिशें हिंसा का शिकार हो रही हैं।
छत्तीसगढ़ में नक्सली संगठन भाकपा (माओवादी) अब कमजोर हो चुका है, लेकिन छोटे दलों से हमले जारी हैं। 2025 में अब तक दर्जनों सरेंडर हुए, फिर भी ऐसी हत्याएं बढ़ रही हैं। केंद्र और राज्य सरकार की संयुक्त रणनीति—सुरक्षा अभियान और विकास योजनाओं—के बावजूद, दुर्गम क्षेत्रों में चुनौतियां बरकरार हैं। स्थानीय नेता और संगठन नक्सलियों के खिलाफ एकजुट हो रहे हैं।
पुलिस जांच से अपराधियों की पहचान हो सकती है, लेकिन नक्सलियों के जंगल छिपने से पकड़ मुश्किल है। सरकार को सरेंडर नक्सलियों के लिए विशेष सुरक्षा और पुनर्वास योजना मजबूत करने की जरूरत है।




