आत्महत्या के लिए उकसाने का दोषी युवक: हाईकोर्ट ने पलटा निचली अदालत का फैसला, कहा- पीड़िता के पास कोई और रास्ता नहीं बचा था
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने शादी के दबाव और लगातार प्रताड़ना से तंग आकर आत्महत्या करने वाली एक युवती के मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को पलटते हुए आरोपी युवक को आत्महत्या के लिए उकसाने का दोषी करार दिया है। जस्टिस एनके ब्यास की एकल पीठ ने स्पष्ट किया कि आरोपी की क्रूर हरकतों के कारण मृतका के पास जान देने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं बचा था। यह फैसला न्याय की राह देख रहे एक सात साल पुराने मामले में आया है, जिसमें अब दोषी युवक को सजा सुनाई जाएगी।
यह सनसनीखेज मामला कोरबा जिले के करतला थाना क्षेत्र का है। 29 जनवरी 2018 की रात युवती अपने कमरे में सोने गई थी। अगली सुबह, उसकी मां रुकनी बाई ने जब दरवाजा खोला तो बेटी का शव स्कार्फ के फंदे से लटका पाया। पुलिस जांच के दौरान मौके से एक सुसाइड नोट और मोबाइल फोन बरामद हुआ। मां की शिकायत के आधार पर पुलिस ने तुरंत कार्रवाई करते हुए मो. सेराज नामक युवक के खिलाफ मामला दर्ज कर जांच शुरू की थी।
पुलिस की गहन जांच और ट्रायल के दौरान यह खुलासा हुआ कि मो. सेराज मृतका से एकतरफा प्यार करता था और उस पर शादी करने के लिए लगातार दबाव बना रहा था। युवती के इंकार करने पर आरोपी उसे और उसकी मां को जान से मारने की धमकियां भी देता था। प्रताड़ना का आलम यह था कि मई 2017 में युवती ने अपने हाथ की नस काटकर आत्महत्या का प्रयास किया था, जिसका इलाज भी चला था। यहां तक कि इस पूरे घटनाक्रम से परेशान होकर युवती की मां ने भी नींद की गोलियां खा ली थीं। गांव के सरपंच, पंच और पुलिस की समझाइश के बावजूद आरोपी की हरकतें नहीं रुकी थीं।
कोरबा के सत्र न्यायालय ने जनवरी 2019 में आरोपी मो. सेराज को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया था। निचली अदालत ने तर्क दिया था कि सुसाइड नोट की हैंडराइटिंग की एक्सपर्ट से जांच नहीं कराई गई थी और आत्महत्या के लिए सीधे तौर पर उकसाने के पर्याप्त सबूत मौजूद नहीं थे। इस फैसले से निराश होकर, मृतका के परिजनों ने हाईकोर्ट में अपील दायर की, जहां उन्हें न्याय की उम्मीद थी।
हाईकोर्ट ने सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद निचली अदालत के फैसले को त्रुटिपूर्ण करार दिया। हाईकोर्ट ने कहा कि निचली अदालत ने मृतका की मां की गवाही को केवल इस आधार पर नजरअंदाज कर दिया कि किसी स्वतंत्र गवाह ने उसका समर्थन नहीं किया था। अपने महत्वपूर्ण फैसले में हाईकोर्ट ने जोर दिया कि किसी भी मामले में साक्ष्यों की संख्या नहीं, बल्कि उनकी गुणवत्ता अधिक महत्वपूर्ण होती है। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब प्रताड़ना और आत्महत्या के लिए उकसाने के मजबूत मौखिक और मेडिकल साक्ष्य मौजूद हों, तो हैंडराइटिंग एक्सपर्ट की राय का अभाव मामले को कमजोर नहीं कर सकता।
इन तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर, हाईकोर्ट ने मो. सेराज को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 306 के तहत आत्महत्या के लिए उकसाने का दोषी ठहराया है। अब इस मामले में सजा तय करने के लिए 27 जुलाई की तारीख निर्धारित की गई है, जिस दिन आरोपी या उसके वकील को अदालत में उपस्थित रहने का निर्देश दिया गया है। यह फैसला उन सभी लोगों के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश है जो प्रताड़ना के जरिए किसी को आत्महत्या के लिए मजबूर करते हैं।




