राज्यरायगढ़

बगमुड़ा तालाब: कभी नगर की ‘धड़कन’ था, आज जलकुंभी का ‘डंपिंग यार्ड’

बगमुड़ा तालाब: कभी नगर की 'धड़कन' था, आज जलकुंभी का 'डंपिंग यार्ड'

15 अगस्त विज्ञापन

गौरी शंकर गुप्ता/​घरघोड़ा | नगर के बीचों-बीच स्थित ऐतिहासिक और जीवनदायिनी बगमुड़ा तालाब आज अपने वजूद के लिए छटपटा रहा है। जिस तालाब का जल कभी कांच की तरह साफ हुआ करता था, आज वहां पानी की जगह जलकुंभी का हरा समंदर नजर आता है। आस्था और परंपराओं का केंद्र रहा यह जलाशय अब प्रशासनिक उपेक्षा के चलते प्रदूषण की भेंट चढ़ चुका है।

​आस्था पर भारी पड़ रही बदहाली

​स्थानीय बुजुर्गों के अनुसार, बगमुड़ा तालाब केवल जल स्रोत नहीं बल्कि घरघोड़ा की सांस्कृतिक पहचान है।
​धार्मिक केंद्र: वर्षों से यहां छठ महापर्व, दुर्गा और गणेश विसर्जन जैसे आयोजन होते आए हैं।
​वर्तमान संकट: जलकुंभी ने तालाब को पूरी तरह अपनी चपेट में ले लिया है। पानी सड़ने लगा है और उठती दुर्गंध ने आसपास के रहवासियों का सांस लेना दूभर कर दिया है।
​’फोटोबाजी’ तक सीमित रहे सफाई अभियान नगरवासियों का आक्रोश प्रशासन और जनप्रतिनिधियों पर फूट रहा है। लोगों का कहना है कि पूर्व में जब भी इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाया गया, तो अमला हरकत में तो आया, लेकिन वह केवल औपचारिकता बनकर रह गया। अधिकारियों ने सफाई के नाम पर केवल फोटो खिंचवाकर सुर्खियां बटोरीं, पर जलकुंभी के उन्मूलन के लिए कोई स्थायी ठोस योजना नहीं बनाई गई।

​हादसों को न्योता देती जलकुंभी

​तालाब की यह स्थिति अब सुरक्षा के लिहाज से भी खतरनाक हो गई है।
​गहराई का भ्रम: जलकुंभी की मोटी परत के कारण सतह और गहराई का अंदाजा लगाना नामुमकिन है।

​जानलेवा खतरा: यहां आने वाले श्रद्धालुओं और विशेषकर बच्चों के लिए अनहोनी की आशंका हर वक्त बनी रहती है।

 

 

​पर्यावरण पर प्रहार: जलीय जीवन पूरी तरह समाप्त होने की कगार पर है।
​जनता की पुकार: “केवल सफाई नहीं, सौंदर्यीकरण चाहिए” > नगरवासियों ने एक सुर में मांग की है कि तालाब की मशीन से व्यापक सफाई हो और जलकुंभी को स्थायी रूप से रोकने के लिए जाल या अन्य आधुनिक तकनीक का उपयोग किया जाए। साथ ही पचरी निर्माण और लाइटिंग कर इसे पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया जाए।

15 अगस्त विज्ञापन
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